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Sunday, January 4, 2026

72825 शिक्षक भर्ती मामला: न्याय की दहलीज पर खड़े अभ्यर्थियों की अंतिम उम्मीद

 72825 शिक्षक भर्ती मामला: न्याय की दहलीज पर खड़े अभ्यर्थियों की अंतिम उम्मीद


त्रिपुरेश पांडेय


72825 बहुचर्चित शिक्षक भर्ती प्रकरण को लेकर वर्षों से न्यायालय में संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों के लिए हालिया घटनाक्रम एक अहम मोड़ पर पहुंच चुका है। 25 जुलाई 2017 से लेकर अंतिम सुनवाई 19 दिसंबर 2025 तक, इस मामले में कई न्यायिक टिप्पणियां, अंतरिम आदेश और मौखिक निर्देश सामने आए हैं। इन सभी पहलुओं को समय-समय पर विभिन्न कानूनविदों और संघर्षरत साथियों ने तर्कों के साथ अभ्यर्थियों के बीच रखा, जो निस्संदेह सराहनीय प्रयास रहा।


हालिया सुनवाई के दौरान माननीय न्यायमूर्ति एवं माननीय न्यायमूर्ति द्वारा खुले न्यायालय में की गई मौखिक टिप्पणियों ने एक नई उम्मीद जगाई है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया कि वर्षों से अभ्यर्थी इस कानूनी लड़ाई को लड़ते आ रहे हैं—वकीलों की फीस, सामाजिक दबाव, मानसिक तनाव और आर्थिक संकट झेलते हुए भी उन्होंने हार नहीं मानी।


न्यूनतम TET कटऑफ और समानता का सवाल

न्यायालय के समक्ष यह तथ्य प्रमुखता से रखा गया कि 7 दिसंबर 2015 को निर्धारित न्यूनतम TET पात्रता—सामान्य वर्ग के लिए 90 अंक और ओबीसी के लिए 83 अंक—के आधार पर लगभग 1100 अभ्यर्थियों को पहले ही नियुक्ति दी जा चुकी है और वे सेवा में कार्यरत हैं। ऐसे में न्यायालय ने यह प्रश्न उठाया कि समान परिस्थितियों में अन्य अभ्यर्थियों को “लिबर्टी के आधार” पर राहत क्यों न दी जाए, विशेषकर वे अभ्यर्थी जो 25 जुलाई 2017 के निर्णय से पहले से न्यायालय की शरण में हैं और वर्तमान अवमानना (Contempt) प्रक्रिया का हिस्सा बने हुए हैं।


न्यायालय यह भी समझना चाहता है कि वास्तव में कितने ऐसे अभ्यर्थी हैं जो दोनों शर्तों—न्यूनतम पात्रता और निरंतर न्यायिक संघर्ष—को पूरा करते हैं। इसके लिए कटऑफ लिस्ट दो हों या चार, यह तकनीकी विषय है, लेकिन मूल प्रश्न समानता (Equity) और न्याय का है।


पूर्व आदेशों के अनुपालन पर सवाल

यह भी न्यायालय के संज्ञान में लाया गया कि 7 दिसंबर 2015 के समानांतर 24 फरवरी 2016, 26 अप्रैल 2016, 26 अगस्त 2016 और अंततः 25 जुलाई 2017 के निर्णयों में पूर्व अंतरिम आदेशों का समुचित अनुपालन नहीं हुआ। चाहे 12091 हो या 580 जैसी सूचियां—कई मामलों में केवल औपचारिकता पूरी की गई, जिससे बड़ी संख्या में योग्य अभ्यर्थी आज भी बाहर रह गए।


उदाहरण स्वरूप, सामान्य वर्ग से बस्ती जनपद के कृष्ण बिहारी पांडेय (90 अंक) और हाथरस से ओबीसी वर्ग के महानंद माहेश्वरी (83 अंक) को न्यूनतम पात्रता के आधार पर नियुक्ति दी गई। ऐसे में बाद में उच्च या निम्न कटऑफ लागू करना कितना न्यायसंगत है—यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है।


निर्णायक क्षण और आगे की रणनीति

2017 से निरंतर संघर्ष करते हुए अनेक अभ्यर्थियों की उम्र गुजर गई, लेकिन उन्हें खारिजी आदेशों के अलावा कुछ नहीं मिला। अब जब न्यायालय विशेष परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 142 के प्रयोग का संकेत दे रहा है, तो यह एक दुर्लभ अवसर माना जा रहा है। यदि इस स्तर पर भी आपसी भ्रम या असहमति के कारण अवसर चूक गया, तो भविष्य में स्थिति और जटिल हो सकती है।


न्यायालय की टिप्पणियों से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि यदि नियोक्ता (सरकार) और न्यायालय के बीच सहमति का वातावरण बनता है, तो लंबे समय से प्रतीक्षित राहत संभव है। अन्यथा, प्रशासनिक तंत्र की मजबूत दलीलें इस संभावना को भी रोक सकती हैं।


यह समय भावनाओं से नहीं, विवेक और एकजुट रणनीति से निर्णय लेने का है। यदि न्यायालय कुछ “देने” की स्थिति में है, तो उसे खुले मन से स्वीकार करना ही व्यावहारिक रास्ता प्रतीत होता है। आगे की रणनीति क्या होगी, यह भविष्य बताएगा—लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह संघर्ष अब अपने निर्णायक चरण में है।



— त्रिपुरेश पांडेय


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