*सेवारत शिक्षकों को टीईटी से छूट के लिए विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत*
विधेयक संख्या XXVII सन् 2026
बालकों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में और संशोधन करने हेतु एक विधेयक।
भारत के गणराज्य के सतहत्तरवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित अधिनियमित किया जाता है—
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1. (1) इस अधिनियम को बालकों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2026 कहा जाएगा।
(2) यह तत्काल प्रभाव से लागू होगा।
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2. बालकों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (जिसे आगे “मूल अधिनियम” कहा गया है) की धारा 23 में—
(क) उपधारा (1) में “न्यूनतम अर्हताएँ” शब्दों के पश्चात
“उपधाराओं (4), (5) एवं (6) के उपबंधों के अधीन” शब्द जोड़े जाएंगे;
(ख) उपधारा (2) में द्वितीय प्रावधान (प्रोवाइजो) को हटा दिया जाएगा; तथा
(ग) उपधारा (3) के पश्चात निम्नलिखित उपधाराएँ जोड़ी जाएँगी, अर्थात—
“(4) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, अधिसूचना, निर्देश या दिशा-निर्देश में निहित किसी भी बात के होते हुए भी, कोई भी शिक्षक जो इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व उस समय लागू भर्ती नियमों, अर्हताओं एवं प्रक्रियाओं के अनुसार किसी विद्यालय में नियुक्त किया गया था, उसे सेवा में बने रहने, पदोन्नति, वरिष्ठता या सेवान्त लाभों के लिए किसी अतिरिक्त अर्हता को प्राप्त करने हेतु बाध्य नहीं किया जाएगा, चाहे वह अर्हता इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व अधिसूचित की गई हो या इसके पश्चात निर्धारित की जाए।
(5) इस अधिनियम के अधीन निर्धारित किसी परीक्षा (टेस्ट) को उत्तीर्ण करने अथवा अन्य अतिरिक्त अर्हताओं की आवश्यकता भावी (prospective) रूप से लागू होगी और केवल उन नियुक्तियों पर लागू होगी जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात या ऐसी किसी भावी तिथि से की जाएँगी, जिसे उपयुक्त सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए।
(6) इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या उपधारा (5) के अधीन अधिसूचित तिथि से पूर्व नियुक्त या कार्यरत किसी भी शिक्षक को, किसी परीक्षा को उत्तीर्ण न करने या ऐसी किसी अतिरिक्त अर्हता को प्राप्त न करने के आधार पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति, सेवा समाप्ति, पदोन्नति से वंचित करना या कोई अन्य प्रतिकूल सेवा परिणाम नहीं भुगतना पड़ेगा।
(7) उपयुक्त सरकार, इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त या कार्यरत शिक्षकों के व्यावसायिक उन्नयन, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण हेतु दिशा-निर्देश निर्धारित करेगी, बिना इन उपायों को सेवा सुरक्षा या पदोन्नति पात्रता से जोड़ते हुए।”
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3. मूल अधिनियम की धारा 23 के पश्चात निम्नलिखित धारा जोड़ी जाएगी, अर्थात—
“23A. (1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, अधिसूचना, निर्देश या दिशा-निर्देश में निहित किसी भी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त या कार्यरत शिक्षकों की सेवा शर्तों, पदोन्नति के अवसरों एवं सेवानिवृत्ति लाभों को किसी नई अर्हता की अनिवार्यता लागू करके उनके प्रतिकूल परिवर्तित नहीं किया जाएगा।
(2) इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात या उपयुक्त सरकार द्वारा अधिसूचित तिथि के पश्चात निर्धारित कोई भी अर्हता भावी रूप से प्रभावी मानी जाएगी।
(3) इस धारा के प्रावधानों का प्रभाव किसी अन्य प्रचलित विधि में निहित किसी भी असंगत प्रावधान के होते हुए भी प्रधान (overriding) होगा।”
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4. मूल अधिनियम की धारा 38 की उपधारा (2) में, खंड (l) के पश्चात निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात—
“(la) धारा 23 की उपधारा (7) के अधीन, इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त या कार्यरत शिक्षकों के व्यावसायिक उन्नयन, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण हेतु दिशा-निर्देश तैयार करना;”
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5. मूल अधिनियम की धारा 39 के पश्चात निम्नलिखित धारा जोड़ी जाएगी, अर्थात—
“39A. उपयुक्त सरकार, इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से, ऐसे निर्देश, स्पष्टीकरण या दिशा-निर्देश जारी कर सकती है जो इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त या कार्यरत शिक्षकों को किसी भी प्रतिकूल सेवा परिणाम से संरक्षण प्रदान करने हेतु आवश्यक हों।”
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उद्देश्य एवं कारण कथन (Statement of Objects and Reasons)
बालकों का निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (अधिनियम संख्या 35, 2009) [जिसे आगे ‘आरटीई अधिनियम’ कहा गया है] संविधान के अनुच्छेद 21क (21A) को प्रभावी बनाने तथा प्रत्येक बालक को समान गुणवत्ता की निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने हेतु अधिनियमित किया गया था।
आरटीई अधिनियम की धारा 23 शिक्षकों के लिए न्यूनतम अर्हताओं के निर्धारण का प्रावधान करती है, जिसके आधार पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को नियुक्ति हेतु एक अर्हता के रूप में निर्धारित किया गया है।
यद्यपि शिक्षक गुणवत्ता में सुधार का उद्देश्य आवश्यक है, तथापि हाल की न्यायिक व्याख्याओं के परिणामस्वरूप टीईटी की अनिवार्यता को उन शिक्षकों पर भी पूर्वव्यापी (retrospective) रूप से लागू किया गया है, जो आरटीई अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व वैध रूप से लागू नियमों, अर्हताओं एवं प्रक्रियाओं के अनुसार नियुक्त किए गए थे। यह स्थिति विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के दिनांक 01.09.2025 के निर्णय ‘Anjuman Ishaat-e-Taleem Trust बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य’ के पश्चात उत्पन्न हुई, जिसमें धारा 23 की व्याख्या करते हुए यह माना गया कि टीईटी केवल नई नियुक्तियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूर्व में नियुक्त शिक्षकों के लिए भी अनिवार्य न्यूनतम अर्हता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि जिन सेवा में कार्यरत शिक्षकों की सेवा शेष अवधि पाँच वर्ष से अधिक है, उन्हें निर्णय की तिथि से दो वर्ष के भीतर, अर्थात 01.09.2027 तक टीईटी उत्तीर्ण करना होगा, अन्यथा उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सामना करना पड़ेगा। जिन शिक्षकों की शेष सेवा अवधि पाँच वर्ष से कम है, उन्हें सीमित राहत दी गई है, परंतु वे टीईटी के अभाव में पदोन्नति के लिए अपात्र बने रहेंगे।
इस प्रकार के पूर्वव्यापी अनुप्रयोग से शिक्षकों में व्यापक चिंता उत्पन्न हुई है, क्योंकि इनमें से अनेक शिक्षकों ने दशकों तक समर्पित सेवा प्रदान की है और विशेष रूप से ग्रामीण, दूरस्थ एवं सामाजिक रूप से वंचित क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा के विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ये शिक्षक प्राथमिक शिक्षा की रीढ़ हैं, और केवल टीईटी अर्हता के अभाव में उन्हें प्रतिकूल स्थिति में डालना न केवल वैध सेवा अपेक्षाओं एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को कमजोर करेगा, बल्कि शिक्षा प्रणाली की निरंतरता एवं संस्थागत स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।
संविधान यह अपेक्षा करता है कि विधायी नीति निष्पक्षता, युक्तिसंगतता एवं अनुपातिकता के सिद्धांतों पर आधारित हो। वैध अपेक्षा का सिद्धांत, मनमाने पूर्वव्यापी दंडात्मक परिणामों के विरुद्ध सिद्धांत, तथा गुणवत्ता सुधार एवं संस्थागत स्थिरता के बीच संतुलन की आवश्यकता, इन सभी के आलोक में एक संतुलित एवं भावी (prospective) दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि शिक्षक पात्रता परीक्षा या अन्य अतिरिक्त अर्हताओं की अनिवार्यता भावी रूप से लागू होगी और केवल उन नियुक्तियों पर लागू होगी जो अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात या अधिसूचित तिथि के बाद की जाएँगी। साथ ही, यह विधेयक अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को विधिक संरक्षण प्रदान करता है, जिससे उनकी सेवा निरंतरता, पदोन्नति के अवसर एवं सेवानिवृत्ति लाभ सुरक्षित रह सकें, जबकि उनके व्यावसायिक उन्नयन एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जा सके, बिना किसी दंडात्मक परिणाम से जोड़ते हुए।
अतः यह विधेयक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य और संवैधानिक निष्पक्षता, समानता तथा अर्जित सेवा अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है, जिससे एक ओर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित हो सके और दूसरी ओर सेवा में कार्यरत शिक्षकों की गरिमा एवं सुरक्षा भी बनी रहे।
यह विधेयक उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रस्तुत किया जाता है।


