मासिक धर्म छुट्टी अनिवार्य की तो महिलाओं को कोई नहीं देगा नौकरी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं को अवकाश दिए जाने के लिए राष्ट्रव्यापी नीति बनाने की मांग पर कहा कि ऐसा कानून बनाने से कोई भी महिलाओं को नौकरी नहीं देगा। शीर्ष अदालत ने इससे संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया। कहा, ऐसा कोई भी प्रावधान समाज में लैंगिक रूढ़ियों को अनजाने में और मजबूत करेगा।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत एवं जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, केंद्र सरकार व सक्षम प्राधिकारी इस अभ्यावेदन और संबंधित पक्षों से परामर्श के बाद नीति बनाने पर विचार कर सकते हैं। याचिका का निपटारा करते हुए प्राधिकारियों को पीठ ने निर्देश दिया कि वे अभ्यावेदन पर उचित निर्णय लें। पीठ ने याचिकाकर्ता शैलेंद्रमणि त्रिपाठी की ओर से याचिका देने की पात्रता पर भी सवाल उठाए।
कहा, कोई महिला स्वयं अदालत के समक्ष नहीं आई और याचिकाकर्ता भी व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं हैं।
त्रिपाठी के वकील एमआर शमशाद ने कहा, कुछ राज्यों व संस्थानों ने मासिक धर्म अवकाश के अनुरूप कदम उठाए हैं। कर्नाटक सरकार ने हाल ही में नीति बनाई है, जबकि ओडिशा में 1992 से ऐसी व्यवस्था है। केरल में भी विद्यालयों में छूट है। कई निजी कंपनियां महिलाओं को स्वेच्छा से अवकाश देती हैं। इस पर सीजेआई ने कहा, स्वेच्छा से अवकाश देना बहुत अच्छी बात है, पर जैसे ही आप कहेंगे
पीठ ने कहा, ऐसी याचिकाएं डर पैदा करने के लिए
ऐसी याचिकाएं डर पैदा करने के लिए
दायर की जाती हैं। ये महिलाओं को हीन बताने के लिए, यह कहने के लिए दायर की जाती हैं कि मासिक धर्म उनके साथ होने वाली कोई बुरी चीज है, पर उस नियोक्ता के बारे में सोचिए, जिसे सवेतन अवकाश देना होगा।
कि यह कानून के तहत अनिवार्य है तो कोई उन्हें जिम्मेदारियां नहीं देगा, यहां तक कि न्यायिक सेवाओं में भी उन्हें सामान्य मुकदमे नहीं सौंपे जाएंगे। मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने से संदेश जा सकता है कि महिलाएं कुछ दिन पुरुषों के बराबर काम नहीं कर सकतीं। जस्टिस बागची ने कहा, बाजार की व्यावहारिक हकीकत को देखें। मानव संसाधन जितना कम आकर्षक होगा, बाजार में उसे नौकरी मिलने की संभावना उतनी ही कम होगी। क्या कोई नियोक्ता अन्य लिंगों के प्रतिस्पर्धी दावों से खुश

