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Wednesday, April 15, 2026

शब्दों के जाल बुनकर बच नहीं सकती बीमा कंपनी

शब्दों के जाल बुनकर बच नहीं सकती बीमा कंपनी




नई दिल्ली। उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में कहा कि बीमा कंपनियां क्लेम देने के लिए शब्दों के जाल बुनकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। आयोग ने पीड़िता के पक्ष में फैसला देते हुए उसे न्याय दिलाया।

दरअसल, पति की मौत के बाद जिस बीमा पॉलिसी से राहत की उम्मीद थी, उसी ने ऐन वक्त पर साथ छोड़ दिया। ऐसे में विधवा उपभोक्ता को न केवल अपनों को खोने का गम सहना पड़ा, बल्कि वह कर्ज और बीमा कंपनी की बेरुखी के बीच कानूनी लड़ाई में भी उलझ गई। बीमा कंपनी ने मौत की वजह को तकनीकी जाल में उलझाकर क्लेम खारिज कर दिया, लेकिन आखिरकार अस्पताल की ओर से जारी मृत्यु प्रमाण पत्र ने पूरा मामला पलटते हुए करीब छह साल बाद पीड़िता को न्याय दिलाया। उत्तर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने मामले में बीमा कंपनी की मनमानी पर सख्त रुख अपनाया। आयोग अध्यक्ष दिव्य ज्योति जयपुरियार, सदस्य अश्विनी कुमार मेहता और हरप्रीत कौर चर्या की पीठ ने एचडीएफसी एर्गो जनरल इंश्योरेंस कंपनी को फटकार लगाते हुए पीड़िता के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह पॉलिसी के तहत देय राशि का भुगतान ब्याज सहित करे और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा भी दे।




ठोस आधार के बिना बदला मौत का कारण




आयोग ने पाया कि कंपनी ने बिना पर्याप्त साक्ष्य के मृत्यु के कारण को बदलने की कोशिश की, जबकि आधिकारिक मृत्यु प्रमाण पत्र सबसे विश्वसनीय दस्तावेज था। आयोग ने माना कि कंपनी ने बिना पर्याप्त आधार के क्लेम खारिज कर सेवा में कमी की। हालांकि, पॉलिसी की शर्तों के अनुसार सह-आवेदक को बीमा राशि का 50% मिलना ही तय था। इस आधार पर आयोग ने कंपनी को 10.28 लाख रुपये देने का आदेश दिया। एक लाख रुपये मानसिक उत्पीड़न के लिए भी देने को कहा।




पॉलिसी में कवर थी बीमारी लेकिन नहीं मिला लाभ


यह मामला संत नगर निवासी ज्योति सिंह की शिकायत से जुड़ा है। ज्योति और उनके पति अतुल शर्मा ने गुरुग्राम में फ्लैट खरीदने के लिए वर्ष 2020 में 19.92 लाख रुपये का होम लोन लिया था। ऋण को सुरक्षित करने के लिए होम क्रेडिट एश्योर बीमा पॉलिसी भी ली, ताकि अनहोनी की स्थिति में परिवार पर कर्ज का बोझ न पड़े। अप्रैल 2021 में पति अतुल की तबीयत बिगड़ी और उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई। अस्पताल ने मृत्यु प्रमाण पत्र में ह्दयाघात को मौत की वजह बताया। यह बीमारी बीमा पॉलिसी के तहत कवर भी थी। लेकिन कंपनी ने क्लेम खारिज कर दिया और कहा कि मौत कोविड निमोनाइटिस से हुई, जो पॉलिसी में शामिल नहीं है।



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