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Wednesday, May 27, 2026

गिरते रुपये से बढ़ रही हमारी मुश्किलें

गिरते रुपये से बढ़ रही हमारी मुश्किलें 

रुपया सर्वकालिक निचले स्तर पर है। एक डॉलर की कीमत 97 रुपये के करीब पहुंच गई है और अनुमान है कि जल्द ही यह 100 का आंकड़ा छू लेगी। आर्थिक जगत में यह गिरावट चर्चा का विषय बनी हुई है। रुपया अभी इतनी तेजी से क्यों गिरा, इसके पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के खिलाफ भारी-भरकम टैरिफ लगाए। नतीजतन, भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात में कमी आई। इससे रुपया प्रभावित हुआ। दूसरी तरफ, ट्रंप के इस कदम से भारत के प्रति वैश्विक निवेशकों के बीच अनिश्चितता बढ़ी और विदेशी पूंजी भारतीय बाजार से निकलने लगी। रही-सही कसर पश्चिम एशिया के तनाव ने पूरी कर दी।



व्यापक स्तर पर देखें, तो रुपये की कमजोरी हमारी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। चूंकि भारत आयात, खासकर ऊर्जा के मामले में अधिक निर्भर है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से ‘आयातित महंगाई’ बढ़ जाती है। इसी तरह, रुपया यदि कमजोर होता रहा, तो सबसे पहला असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा। इसका असर दिखने भी लगा है। ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स ने तो यहां तक कह दिया कि यदि कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है और गैस की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर से 50 प्रतिशत ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत का आयात बिल हर महीने लाखों डॉलर बढ़ सकता है। इससे महंगाई और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ेगी और फल, सब्जियां, राशन आदि महंगे हो जाएंगे। इसके साथ ही, मोबाइल, लैपटॉप, टीवी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, क्योंकि इनके अधिकांश पुर्जे विदेश से आतेे हैं। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वालों पर भी इसका असर पड़ेगा। अब डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये देने होंगे। इसके अलावा, यदि रुपये को स्थिर करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है, तो होम लोन, कार लोन और अन्य लोन महंगे हो जाएंगे।




साफ है, सरकार को गैर-जरूरी आयात, विशेषकर सोना और लग्जरी वस्तुओं के आयात पर नियंत्रण तथा आवश्यक होने पर टैक्स बढ़ाने चाहिए, ताकि डॉलर की अनावश्यक निकासी कम होे। दीर्घकालिक समाधान यही है कि भारत आयात पर निर्भरता घटाए, ‘मेक इन इंडिया’ को अधिक प्रभावी बनाए, विनिर्माण और निर्यात क्षमता बढ़ाए तथा ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़े। ऐसे समन्वित प्रयास ही रुपये को अधिक स्थिर बना सकते हैं।

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