Petrol-Diesel Price Hike: पेट्रोल-डीजल फिर हो सकते हैं महंगे, रिपोर्ट में 2.5 रुपये और बढ़ने की आशंका
Petrol-Diesel Price Update: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल के दिनों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। अब एक नई रिपोर्ट में संकेत दिए गए हैं कि आने वाले समय में ईंधन के दामों में और इजाफा हो सकता है।
चार बार में 7.5 रुपये से ज्यादा बढ़ चुके हैं दाम
पिछले कुछ दिनों में तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार संशोधन किया है। आंकड़ों के अनुसार:
15 मई: पेट्रोल और डीजल दोनों के दाम में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी।
19 मई: करीब 90 पैसे प्रति लीटर का इजाफा।
23 मई: पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे महंगा हुआ।
25 मई: पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर बढ़ा।
इन चार बढ़ोतरी के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतें कुल मिलाकर लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ चुकी हैं।
आगे भी बढ़ सकते हैं दाम
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियां अपने घाटे की भरपाई के लिए कीमतों में और वृद्धि कर सकती हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है। यानी वर्तमान स्तर से पेट्रोल-डीजल करीब 2.5 रुपये और महंगे हो सकते हैं।
महंगाई पर बढ़ेगा दबाव
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। जब पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं, तो माल ढुलाई और परिवहन खर्च बढ़ जाता है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन महंगा होने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई में भी वृद्धि हो सकती है। यदि कीमतों में कुल 10 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी होती है, तो महंगाई पर इसका प्रभाव और अधिक दिखाई दे सकता है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर भारत में करीब 71 प्रतिशत माल ढुलाई सड़क मार्ग से होती है। ट्रांसपोर्ट कंपनियों के कुल खर्च में ईंधन की हिस्सेदारी लगभग 42 प्रतिशत होती है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल के महंगे होने से लॉजिस्टिक्स लागत तेजी से बढ़ती है।
इसका सबसे ज्यादा असर दूध, दही, फल, सब्जियां, दालें, मसाले, चाय, कॉफी, अंडे, मांस और मछली जैसी आवश्यक वस्तुओं पर पड़ सकता है, क्योंकि इनकी आपूर्ति बड़े पैमाने पर परिवहन व्यवस्था पर निर्भर करती है।
कई उद्योगों की लागत बढ़ सकती है रिपोर्ट के मुताबिक ईंधन और ऊर्जा लागत बढ़ने से कई उद्योगों पर भी दबाव बढ़ेगा। कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, सीमेंट, लकड़ी और सिरेमिक जैसे क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसके चलते कंपनियां उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी कर सकती हैं।
कुछ कंपनियां कीमतें बढ़ाने के बजाय श्रिंकफ्लेशन का रास्ता भी अपना सकती हैं। इसमें उत्पाद का वजन या मात्रा कम कर दी जाती है, लेकिन कीमत पहले जैसी ही रखी जाती है। कच्चे तेल की ऊंची कीमत बनी चिंता विशेषज्ञों के अनुसार हाल के महीनों में कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 112 डॉलर प्रति बैरल रही है, जबकि अनुमानित कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। यही वजह है कि महंगाई और ईंधन कीमतों पर दबाव लगातार बना हुआ है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जल्द राहत नहीं मिलती, तो पेट्रोल और डीजल के दामों में आगे भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इसका असर केवल वाहन चालकों पर ही नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थों, परिवहन और कई अन्य क्षेत्रों की कीमतों पर भी पड़ने की संभावना है।
