बीमारी में भी ड्यूटी निभाती रहीं प्रधानाध्यापिका बदरे सबा नूरी, ट्रांसफर की गुहार के बीच असमय निधन; शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल
परिजनों और करीबियों का आरोप—लगातार काम के दबाव से बिगड़ रही थी तबीयत, पास के विद्यालय में स्थानांतरण के लिए विभाग से करती रहीं आग्रह
पटना/सासाराम।
एक शिक्षक के लिए विद्यालय केवल कार्यस्थल नहीं होता, बल्कि वह उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है। लेकिन जब यही जिम्मेदारी बीमारी और लगातार बढ़ते कार्यदबाव के बीच निभानी पड़े, तो सवाल केवल एक कर्मचारी की परेशानी का नहीं रह जाता—सवाल पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता का बन जाता है।
प्रधानाध्यापिका बदरे सबा नूरी के असमय निधन ने ऐसे ही कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
20 अगस्त को बदरे सबा नूरी का अचानक निधन हो गया। बताया जा रहा है कि पिछले कई सप्ताह से उनकी तबीयत खराब चल रही थी। इसके बावजूद उन्होंने विद्यालय जाना और अपने शैक्षणिक एवं प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन जारी रखा। बीमारी की स्थिति में भी विद्यालय और विद्यार्थियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी कम नहीं हुई।
लेकिन इसी बीच उनके परिवार और करीबियों की ओर से शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और कथित कार्यदबाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
---
बीमारी के बीच भी नहीं छोड़ा कर्तव्य
बदरे सबा नूरी अपने काम के प्रति ईमानदार और जिम्मेदार प्रधानाध्यापिका के रूप में जानी जाती थीं। विद्यालय की जिम्मेदारियों को लेकर उनकी गंभीरता ऐसी थी कि स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्यों से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
विद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था, शिक्षकों से जुड़े दायित्व, विद्यार्थियों की पढ़ाई और विभागीय निर्देशों का अनुपालन—इन तमाम जिम्मेदारियों के बीच वह लगातार काम करती रहीं।
करीबियों के अनुसार, बीमारी के दौरान उनके लिए रोज विद्यालय तक पहुंचना और काम संभालना आसान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने अपने दायित्व को प्राथमिकता दी।
यही सवाल अब सबसे बड़ा है—क्या एक ईमानदार कर्मचारी की कर्तव्यनिष्ठा को उसकी मजबूरी बना देना किसी व्यवस्था की संवेदनशीलता है?
---
पास के विद्यालय में ट्रांसफर की करती रहीं गुहार
परिजनों और उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण बदरे सबा नूरी पिछले कई सप्ताह से विभागीय स्तर पर यह आग्रह कर रही थीं कि उनका स्थानांतरण किसी नजदीकी विद्यालय में कर दिया जाए, ताकि बीमारी की स्थिति में उन्हें लंबी दूरी तय करके विद्यालय आने-जाने की परेशानी न उठानी पड़े।
बताया जाता है कि उन्होंने अपनी परेशानी विभाग के समक्ष रखी थी और स्थानांतरण की गुहार लगाई थी।
लेकिन यदि यह दावा सही है कि उनकी तबीयत लगातार खराब थी और उन्होंने विभाग से बार-बार नजदीकी विद्यालय में स्थानांतरण का अनुरोध किया था, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या उनकी स्थिति पर समय रहते गंभीरता से विचार किया गया?
क्या उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्या को विभागीय स्तर पर संवेदनशीलता के साथ देखा गया?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या समय रहते राहत मिल सकती थी?
इन सवालों का जवाब अब शिक्षा विभाग को देना चाहिए।
---
काम का दबाव या व्यवस्था की विफलता?
बदरे सबा नूरी के निधन को सीधे तौर पर विभागीय कार्यदबाव का परिणाम बताना बिना चिकित्सकीय या आधिकारिक जांच के उचित नहीं होगा। लेकिन उनके करीबियों द्वारा बीमारी, काम के दबाव और स्थानांतरण के लिए किए गए अनुरोध के बीच जो परिस्थितियां बताई जा रही हैं, वे जांच और गंभीर प्रशासनिक समीक्षा की मांग जरूर करती हैं।
किसी भी सरकारी कर्मचारी से काम लेना विभाग का अधिकार और जिम्मेदारी है। लेकिन कर्मचारी की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति सामने आने के बाद उसके कार्यभार और कार्यस्थल को लेकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अगर एक बीमार प्रधानाध्यापिका अपनी समस्या विभाग तक पहुंचा रही थीं और फिर भी उन्हें राहत नहीं मिली, तो यह केवल एक तबादले का मामला नहीं रह जाता। यह प्रशासनिक संवेदनशीलता का प्रश्न बन जाता है।
---
प्रधानाध्यापिका थीं, इसलिए जिम्मेदारी भी कम नहीं थी
विद्यालय की प्रधानाध्यापिका की भूमिका किसी सामान्य कर्मचारी से अलग होती है। विद्यालय के शैक्षणिक माहौल से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां प्रधानाध्यापिका के कंधों पर होती हैं।
बदरे सबा नूरी ने इसी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया।
बीमारी के दौरान भी उन्होंने अपने विद्यालय और विद्यार्थियों से दूरी नहीं बनाई। लेकिन व्यवस्था का दूसरा पक्ष यह भी है कि जो व्यक्ति दूसरों की जिम्मेदारी उठा रहा हो, उसकी अपनी परेशानी की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
यही प्रश्न अब उनके निधन के बाद और अधिक तीखा हो गया है।
---
एक शिक्षिका चली गईं, लेकिन पीछे छोड़ गईं कई सवाल
बदरे सबा नूरी के निधन से उनका परिवार, उनके विद्यार्थी और उनसे जुड़े लोग गहरे सदमे में हैं। लेकिन इस व्यक्तिगत क्षति के साथ अब शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कुछ व्यापक सवाल भी सामने आ रहे हैं।
क्या सरकारी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए विभाग के पास कोई प्रभावी संवेदनशील तंत्र है?
क्या गंभीर बीमारी की स्थिति में कर्मचारी के कार्यस्थल को लेकर मानवीय आधार पर तत्काल निर्णय लेने की व्यवस्था प्रभावी है?
क्या विभागीय अधिकारियों तक पहुंचने वाली ऐसी शिकायतों और स्थानांतरण संबंधी अनुरोधों की समयबद्ध समीक्षा होती है?
और यदि कोई कर्मचारी लगातार अपनी परेशानी बता रहा हो, तो उसकी शिकायत पर कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों का जवाब केवल बदरे सबा नूरी के परिवार को नहीं, बल्कि उन हजारों शिक्षकों को भी चाहिए जो सरकारी शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं।
---
शिक्षकों से जवाबदेही जरूरी, लेकिन विभाग भी जवाबदेह हो
शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए शिक्षकों से जवाबदेही निश्चित रूप से जरूरी है। विद्यालय में समय पर पहुंचना, विद्यार्थियों को पढ़ाना, प्रशासनिक कार्य करना और विभागीय निर्देशों का पालन करना शिक्षक की जिम्मेदारी है।
लेकिन जवाबदेही एकतरफा नहीं हो सकती।
जब सरकार और विभाग अपने कर्मचारियों से ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की अपेक्षा करते हैं, तब कर्मचारियों के स्वास्थ्य, कार्य परिस्थितियों और मानवीय आवश्यकताओं के प्रति विभाग की भी जवाबदेही बनती है।
बदरे सबा नूरी का मामला इसी संतुलन की याद दिलाता है।
---
क्या शिक्षा विभाग करेगा मामले की समीक्षा?
अब आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा विभाग इस पूरे मामले को केवल एक कर्मचारी के निधन के रूप में न देखे, बल्कि उन परिस्थितियों की भी समीक्षा करे जिनमें वह काम कर रही थीं।
यदि उन्होंने वास्तव में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण नजदीकी विद्यालय में स्थानांतरण का अनुरोध किया था, तो उनके आवेदन कब-कब दिए गए, किस अधिकारी के स्तर पर मामला लंबित रहा और उस पर क्या कार्रवाई हुई—इन सभी बिंदुओं की प्रशासनिक जांच होनी चाहिए।
साथ ही, यदि कार्यदबाव को लेकर कोई लिखित शिकायत या विभागीय रिकॉर्ड उपलब्ध है, तो उसकी भी समीक्षा की जानी चाहिए।
क्योंकि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की जांच जरूरी है।
लेकिन जांच न होना उससे भी बड़ा सवाल होगा।
---
बदरे सबा नूरी की सबसे बड़ी पहचान उनकी कर्तव्यनिष्ठा थी
आज जब उनकी तस्वीर सामने आती है, तो एक ऐसी प्रधानाध्यापिका दिखाई देती हैं जो अपने विद्यार्थियों और विद्यालय के बीच अपनी जिम्मेदारियों को निभाती रहीं।
उनके जीवन की विडंबना यही है कि जिस कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें याद किया जा रहा है, उसी कर्तव्यनिष्ठा के बीच उनके स्वास्थ्य और प्रशासनिक परेशानियों की कहानी भी सामने आ रही है।
उनका निधन केवल एक परिवार की क्षति नहीं है।
यह शिक्षा व्यवस्था के सामने एक आईना भी है।
क्या हम अपने शिक्षकों से केवल काम लेने वाली व्यवस्था बन रहे हैं, या उनकी तकलीफ सुनने और समय पर राहत देने वाली व्यवस्था भी बना पा रहे हैं?
बदरे सबा नूरी अब इस सवाल का जवाब सुनने के लिए हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन शिक्षा विभाग के पास अभी भी जवाब देने का अवसर है।
उनकी मौत के कारणों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और चिकित्सकीय तथ्यों से ही निकलेगा, लेकिन उनके द्वारा कथित रूप से की गई स्थानांतरण की गुहार और बीमारी के बावजूद ड्यूटी निभाने की परिस्थितियों की निष्पक्ष समीक्षा अब जरूरी है।
क्योंकि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की असली संवेदनशीलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वह बच्चों को क्या पढ़ाती है—
बल्कि इससे भी मापी जाती है कि वह बच्चों को पढ़ाने वाले अपने शिक्षकों के साथ कैसा व्यवहार करती है।
बदरे सबा नूरी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि उनके मामले से जुड़े हर सवाल का जवाब तथ्य, पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ सामने आए।
