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Saturday, March 28, 2026

झटका: कमजोर होता रुपया बढ़ाएगा आम आदमी की जेब पर बोझ

 झटका: कमजोर होता रुपया बढ़ाएगा आम आदमी की जेब पर बोझ

डॉलर की मजबूती से रुपये पर बन रहा भारी दबाव

तेल की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से घरेलू मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि घरेलू शेयर बाजारों में आई तेज गिरावट और विदेशी निवेशकों (एफआईआई) द्वारा निकासी से स्थानीय मुद्रा पर और दबाव पड़ा है। उन्होंने अकेले मार्च में 11 अरब डॉलर की निकासी की है। राम नवमी के कारण शेयर, विदेशी मुद्रा, जिंस और सर्राफा बाजार बंद थे। दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की स्थिति को दर्शाने वाला डॉलर सूचकांक 0.11% की बढ़त के साथ 100 पर रहा।




केमिकल और प्लास्टिक


युद्ध के कारण पेट्रोकेमिकल सप्लाई बाधित हो रही है, जिससे प्लास्टिक की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। पैकेजिंग के सामान महंगे हो रहे है। इससे रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। बोतल, कंटेनर और प्लास्टिक की पैकेजिंग में आने वाले सामान की दाम बढ़ेंगे।




युद्ध लंबा चला तो हर घर तक पहुंचेगा संकट




अभी तक भारत सरकार की कोशिश है कि युद्ध के कारण कच्चा तेल और अन्य आयात महंगा होने का बोझ आम आदमी की जेब पर न डाला जाए। इसलिए सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को कम किया है। सरकार को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में युद्ध थमने पर स्थिति सामान्य होगा, लेकिन युद्ध लंबा चलता है तो उसका बोझ भारत में हर आदमी की जेब पर पड़ेगा।




नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान से जुड़े संकट के बाद भारतीय रुपये पर दबाव देखने को मिला है। डॉलर के मुकाबले रुपया हाल के दिनों में करीब तीन प्रतिशत तक कमजोर हुआ है।




28 फरवरी को जहां एक डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 91 रुपये के आसपास थी तो वहीं शुक्रवार को 94.85 रुपये के स्तर पर पहुंचा है। यह सिर्फ रुपये में गिरावट नहीं है, बल्कि भारत के लिए आयात अब महंगा होता जा रहा है।




मौजूदा वित्त वर्ष में डॉलर के मुकाबले रुपया 10 फीसदी गिर चुका है जो वित्त वर्ष 2012 के बाद रुपये में सबसे बड़ी गिरावट है। वित्त वर्ष 2012 में रुपया 10 फीसदी से ज्यादा टूटा था लेकिन इस बार युद्ध के चलते रुपये में गिरावट का दौर जारी है। इससे भारत का आयात बिल भी तेजी से बढ़ रहा है। रुपये में गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के चलते भारत को कच्चा तेल खरीदने में ज्यादा धनराशि खर्च करनी पड़ी रही है। इससे अकेले कच्चे तेल में नहीं बल्कि आयात किए जाने वाले उत्पादों के बदले भारत को ज्यादा धनराशि खर्च करनी पड़ रही है, जिसका असर आने वाले दिनों में आम आदमी की जेब पर देखने को मिलेगा।




जानकार मानते हैं कि अगर ईरान युद्ध जारी रहता है तो भारत का आयात बिल सालाना 56 से 60 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।




अन्य सामान भी महंगे होंगे




लंबे समय तक युद्ध जारी रहने पर तेल के दाम बढ़ेंगे। इसके साथ, विदेश से आयात करना भी महंगा होगा, जिसका असर दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली आम उपभोक्ता से जुड़ी वस्तुएं भी महंगी होंगी।




इलाज कराना होगा महंगा




28 फरवरी के बाद से अब तक कुछ श्रेणी के कच्चे माल की कीमतों में 300% का उछाल आया है। दवाओं का कच्चा माल सबसे ज्यादा महंगा हुआ है। खासकर घोलने और प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के दाम तेजी से बढ़े हैं। दवाओं में इस्तेमाल होने वाले अन्य पदार्थों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं।




50 हजार करोड़ का बोझ




अनुमान है कि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक भारत का आयात बिल 50 हजार करोड रुपये से अधिक बढ़ चुका है। अगर यु्द्ध लंबा चलता है तो भारत पर करीब चार लाख करोड़ का अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा।

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