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Thursday, April 2, 2026

तलाक उसी तारीख से लागू होगा, जिस दिन दिया जाए

तलाक उसी तारीख से लागू होगा, जिस दिन दिया जाए

प्रयागराज, । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मोहम्मदिया कानून के तहत, तलाक उसी तारीख से लागू होता है, जिस दिन पति तलाक का ऐलान करता है। बाद में कोर्ट का जो आदेश इसकी पुष्टि करता है, वह सिर्फ़ ऐलानिया प्रकृति का होता है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने हुमायरा रियाज़ की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि कोर्ट का ऐसा आदेश फैसले की तारीख से कोई नया तलाक नहीं बनाता, बल्कि यह तलाक के ऐलान की मूल तारीख से ही जुड़ा माना जाता है।



याचिका में प्रयागराज परिवार न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए उसकी अर्ज़ी खारिज कर दी गई। हालांकि, उस आदेश में उसके दो नाबालिग बेटों को भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया। परिवार न्यायालय ने उसके दावे को मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज किया था कि उसकी दूसरी शादी की तारीख तक उसकी पहली शादी कानूनी तौर पर खत्म नहीं हुई, इसलिए दूसरी शादी अमान्य थी।




कोर्ट के सामने पत्नी के वकील ने यह दलील दी कि उसके पहले पति ने 27 फरवरी, 2005 को ही तलाक का ऐलान कर दिया था। बाद में एक ऐलानिया मुकदमा दायर किया गया और 8 जनवरी, 2013 को एक आदेश पारित किया गया था, जिसने 2005 के तलाक को वैध घोषित किया। उसके वकील ने यह तर्क दिया कि अपनी ‘इद्दत’ की अवधि पूरी करने के बाद उसने मई 2012 में अपनी दूसरी शादी की थी और उसके दूसरे पति को पहले हुए तलाक की पूरी जानकारी थी। यह भी तर्क दिया गया कि किसी महिला को शादी की वैधता के संबंध में सिर्फ़ तकनीकी आपत्तियों के आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पति ने जानबूझकर शादी की हो और दोनों पक्ष पति-पत्नी के रूप में साथ रहे हों।




दूसरी ओर, पति के वकील ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने अपने पहले पति से वैध तलाक लिए बिना ही दूसरी शादी कर ली थी। यह कहा गया कि चूंकि तलाक का आदेश 2013 में ही दिया गया, इसलिए 2012 में हुई कथित दूसरी शादी मोहम्मदिया कानून के तहत अमान्य थी। हालांकि, कोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज कर दिया, क्योंकि उसने पाया कि जहां कोई पति तलाक़ देता है। उसके बाद किसी डिक्री के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है तो वह डिक्री केवल उस तलाक की स्थिति की पुष्टि करती है जो पहले ही हो चुका होता है।




अदालत ने कहा कि परिवार न्यायालय ने जो तरीका अपनाया, वह उस स्थापित कानूनी स्थिति के अनुरूप नहीं था कि ऐसे मामलों में डिक्री केवल घोषणात्मक होती है। हालांकि, अदालत ने आगे यह भी कहा कि जहां तलाक की वैधता पर विवाद हो, वहां ट्रायल कोर्ट को सबूतों की जांच करनी चाहिए ताकि यह ठीक से तय किया जा सके कि क्या तलाक़ कानून के अनुसार वैध रूप से दिया गया। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसके तहत उसने याचिकाकर्ता को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया। इस मामले को गुण दोष के आधार पर निर्णय के लिए परिवार न्यायालय को वापस भेज दिया है।



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