इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 'शिक्षकों का तबादला सजा नहीं, प्रक्रिया में पारदर्शिता अनिवार्य'
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 'शिक्षकों का तबादला सजा नहीं, प्रक्रिया में पारदर्शिता अनिवार्य'
प्रयागराज |
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूलों में 'सरप्लस' (अतिशेष) शिक्षकों के समायोजन को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा है कि शिक्षकों का स्थानांतरण डेटा-आधारित और पारदर्शी होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थानांतरण की प्रक्रिया किसी भी स्थिति में मनमानी, दंडात्मक या भेदभावपूर्ण नहीं होनी चाहिए।
शिक्षा का अधिकार और छात्रों का हित सर्वोपरि
न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह एवं न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सौरभ कुमार सिंह व अन्य की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि तबादलों का मुख्य उद्देश्य 'शिक्षा का अधिकार कानून' (RTE) का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करना और छात्रों का शैक्षणिक कल्याण होना चाहिए, न कि शिक्षकों को परेशान करना।
हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश:
न्यूनतम शिक्षक उपलब्धता: वर्तमान समायोजन प्रक्रिया इस तरह अपनाई जाए कि प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षकों की उपस्थिति अनिवार्य रूप से सुनिश्चित हो सके।
यथास्थिति का सम्मान: जिन स्कूलों में पहले से ही दो या उससे अधिक शिक्षक मौजूद हैं, वहां फिलहाल किसी भी तरह का बदलाव या नया स्थानांतरण न किया जाए।
डेटा की विश्वसनीयता: कोर्ट ने यह निर्देश उन शिकायतों के बाद दिया जिनमें कहा गया था कि स्थानांतरण के लिए उपयोग किया जा रहा पोर्टल (यू-डायस) का डेटा अविश्वसनीय और अपारदर्शी है।
पारदर्शिता पर जोर
अपीलकर्ताओं ने शिकायत की थी कि विभाग जिस डेटा के आधार पर सरप्लस शिक्षकों की सूची तैयार कर रहा है, उसमें भारी विसंगतियां हैं। इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया को इस तरह पारदर्शी बनाया जाए जिससे किसी भी शिक्षक के साथ अन्याय न हो और स्कूलों में शिक्षकों का संतुलन बना रहे।
कोर्ट के इस रुख से उन शिक्षकों को बड़ी राहत मिली है जो दोषपूर्ण डेटा के कारण गलत तरीके से किए जा रहे स्थानांतरण की आशंका से डरे हुए थे। अब विभाग को डेटा की शुद्धता और आरटीई मानकों का विशेष ध्यान रखना होगा।

