शिक्षामित्रों को स्थायित्व देने की मांग तेज, उमा देवी से जग्गू केस तक बदले न्यायिक संकेत
प्रदेश में शिक्षामित्रों को लेकर एक बार फिर स्थायी नियुक्ति की मांग जोर पकड़ती दिख रही है। लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षामित्रों का कहना है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ, जबकि उन्होंने निर्धारित योग्यता भी पूरी कर ली है।
विवाद की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का 2006 का उमा देवी केस है, जिसके आधार पर बड़ी संख्या में शिक्षामित्रों की नियुक्ति निरस्त कर दी गई थी। उस समय अदालत ने नियमों और भर्ती प्रक्रिया की शुद्धता को प्राथमिकता दी थी।
हालांकि, हाल के वर्षों में न्यायिक दृष्टिकोण में बदलाव देखने को मिला है। 2024 के जग्गू केस में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाया जाना चाहिए और हर मामले में पुराने फैसलों को आंख बंद कर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
शिक्षामित्रों का तर्क है कि—
उन्होंने 20–25 वर्षों से अधिक सेवा दी है
बाद में NCTE की निर्धारित शैक्षिक योग्यता भी प्राप्त की
फिर भी उन्हें स्थायित्व से वंचित रखा गया
दिलचस्प बात यह भी सामने आ रही है कि इसी तरह के मामलों में उत्तराखंड में शिक्षामित्रों को नियमित किया जा चुका है, जिससे उत्तर प्रदेश में भी समान निर्णय की मांग तेज हो गई है।
शिक्षामित्रों ने सरकार से अपील की है कि—
👉 नियमों के साथ न्याय किया जाए
👉 योग्यता के साथ सम्मान मिले
👉 वर्षों की सेवा को ध्यान में रखते हुए स्थायी नियुक्ति दी जाए
विशेषज्ञों का मानना है कि अब न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर संतुलन बनाते हुए ऐसा समाधान निकालने की जरूरत है, जिसमें नियमों के साथ-साथ मानवीय पहलू भी शामिल हो।
अब देखना होगा कि सरकार और न्यायपालिका इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है।

