TET अनिवार्यता पर विवाद: 2017 के राजपत्र से बदले नियम, इसी राजपत्र से कार्यरत शिक्षकों की बढ़ी चिंता, सुप्रीम कोर्ट का यह है रुख, कैसे होगा स्थाई समाधान, जानिए सब कुछ
देशभर में शिक्षक भर्ती और योग्यता से जुड़े नियमों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। खासकर TET (Teacher Eligibility Test) की अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों के बीच असमंजस और असंतोष देखने को मिल रहा है। इसकी मुख्य वजह वर्ष 2017 में जारी किया गया संशोधित राजपत्र माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, वर्ष 2009 में लागू शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009) के तहत 2010 में बनाए गए नियमों में यह स्पष्ट उल्लेख था कि 2010 से पहले कार्यरत शिक्षकों पर TET की बाध्यता लागू नहीं होगी।
लेकिन वर्ष 2017 में केंद्र सरकार द्वारा एक संशोधन जारी किया गया, जिसमें इन प्रावधानों में बदलाव कर दिया गया। इसी संशोधन के बाद TET को अधिक व्यापक रूप से अनिवार्य बना दिया गया।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट का क्या है रुख?
इस संशोधित नियम के आधार पर जब मामला न्यायालय में पहुंचा, तो सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने निर्णय में कहा कि:
👉 मौजूदा नियमों के अनुसार सभी शिक्षकों को TET उत्तीर्ण करना आवश्यक है।
न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि उसका कार्य केवल बने हुए कानून और नियमों का पालन सुनिश्चित कराना है, न कि उन्हें बदलना।
❗ शिक्षकों की क्या है मांग?
कई शिक्षक संगठनों और अभ्यर्थियों का मानना है कि:
2010 के नियमों में पहले से कार्यरत शिक्षकों को छूट दी गई थी
2017 के संशोधन ने इस छूट को समाप्त कर दिया
इससे पुराने शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है
उनकी मांग है कि सरकार इस संशोधन पर पुनर्विचार करे।
🏛️ समाधान क्या हो सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र सरकार चाहे तो:
अगर भारत सरकार चाहे तो इस वर्ष 2017 राजपत्र के संशोधन को समाप्त करने हेतु पुनः rte एक्ट संशोधन बिल ले आए तो सभी की समस्या हल हो जाएगी
👉 RTE Act में पुनः संशोधन कर 2017 के बदलाव को समाप्त किया जा सकता है
इससे पुराने शिक्षकों को राहत मिल सकती है और विवाद भी खत्म हो सकता है।
TET की अनिवार्यता का मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि नीतिगत भी है। जहां एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने नियमों के अनुसार फैसला दिया है, वहीं अब निगाहें सरकार पर टिकी हैं कि वह इस विषय में कोई नया कदम उठाती है या नहीं।

