सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: 'शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य, तो आयोग साल में दो बार क्यों नहीं करा सकता परीक्षा?'
लखनऊ: शिक्षकों की पात्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक अर्हता परीक्षा (TET) पास करना अनिवार्य रहेगा। इस फैसले ने जहां एक तरफ प्रदेश के लाखों शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को भी बड़ी कसौटी पर खड़ा कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि नियमों के मुताबिक TET की परीक्षा साल में दो बार आयोजित की जानी चाहिए। कोर्ट के इस आदेश के बाद अब सवाल खुद परीक्षा नियामक और सरकार पर उठ रहे हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश में पिछले चार साल से एक बार भी TET परीक्षा का सफल आयोजन नहीं हो सका है।
आयोग की सुस्ती पर उठे सवाल, 2022 से अटकी है परीक्षा
रिकॉर्ड्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में आखिरी बार साल 2021 में TET के लिए आवेदन मांगे गए थे, लेकिन पेपर लीक होने के कारण मामला लटक गया और आखिरकार यह परीक्षा जैसे-तैसे 2022 में आयोजित हो सकी। तब से लेकर अब तक (पिछले चार सालों में) यूपी में TET की परीक्षा नहीं हुई है। हालांकि, कई बार टलने के बाद अब आगामी 2 से 4 जुलाई के बीच इस परीक्षा को कराए जाने का प्रस्ताव है।
प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
"नियम तो हमेशा से साल में दो बार परीक्षा कराने का था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा दोहराया है। अगर कोर्ट के कड़े नियम और आदेश शिक्षकों पर लागू होते हैं, तो वही नियम सरकार और शिक्षा सेवा चयन आयोग पर भी समान रूप से लागू होने चाहिए।"
5 लाख से अधिक शिक्षक होंगे प्रभावित
NCTE (नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन) की गाइडलाइन के अनुसार, अब सभी कार्यरत शिक्षकों के लिए भी TET अनिवार्य कर दिया गया है। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन शिक्षकों पर पड़ रहा है जिनकी नियुक्ति 2011 में TET अनिवार्य होने से पहले हुई थी और वे पदोन्नत होकर जूनियर हाईस्कूलों में पढ़ा रहे हैं।
इस नए आदेश से अकेले यूपी बेसिक शिक्षा परिषद के करीब पौने दो लाख शिक्षक सीधे प्रभावित होंगे। यदि इसमें राजकीय, सहायता प्राप्त (एडेड) और निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी शामिल कर लिया जाए, तो प्रभावित होने वाले शिक्षकों की कुल संख्या 5 लाख के पार पहुंच जाती है। हालांकि, कोर्ट ने राहत के तौर पर परीक्षा पास करने के लिए समय सीमा को एक साल आगे बढ़ा दिया है, लेकिन परीक्षा से छूट देने से साफ इनकार कर दिया है।
आर-पार की लड़ाई के मूड में शिक्षक संगठन
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से शिक्षक बिरादरी में भारी आक्रोश है। शिक्षकों का तर्क है कि जब उनकी नियुक्ति हुई थी, तब TET जैसी कोई शर्त नहीं थी; ऐसे में सेवा के बीच में उन पर यह नियम थोपना न्यायसंगत नहीं है।
शिक्षक संगठनों ने अब इस लड़ाई को सड़क से लेकर संसद तक ले जाने का एलान किया है। 'टीचर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया' के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनेश चंद्र शर्मा ने स्पष्ट किया कि शिक्षक इस फैसले के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। उन्होंने कहा कि संगठन इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रहा है और जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटिशन (Curative Petition) दायर करने पर विचार करेगा।

