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Wednesday, October 27, 2021

छह माह से नहीं मिला मानदेय, घर में आ गई है फाकाकशी की नौबत, अब दिवाली कैसे मनाएं

तीन लाख बच्चों को भोजन कराने वाली रसोइयों के बच्चे भूखे रहने को मजबूर, आखिरी बार मिला था मार्च का मानदेय

बस्ती आखिरी बार मार्च का मानदेय मिला था। इस बात को छह महीन हो चुके हैं। तब से एक पैसा भी नहीं मिला। घर में फाकाकशी की नौबत आ गई है। कई बार बच्चों को भूखे सोना पड़ता है। यह सब देख मन खुद को कोसता है। गुस्सा भी आता है, लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं। अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, लेकिन मेहनताना नहीं मिलता।



बार-बार गुहार लगाते हैं पर कोई नहीं | आश्वासन की घुट्टी सुनता। पिला दी जाती है। जिम्मेदार कहते हैं कि शासन से बजट आने पर बकाया भुगतान कर दिया जाएगा। अब इन्हें कौन बताए कि तब तक हम और हमारे बच्चे क्या करें क्या खाकर जिंदा रहें।


इतना कहते ही भानपुर की इस रसोइयां का गला रुंध गया। इसके बाद किए गए किसी भी सवाल का उसने जवाब नहीं दिया। छह माह से मानदेय नहीं मिलने से मात्र एक रसोइये की दशा दयनीय नहीं हुई है। प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों की थाली में भोजन परोसने वाली अधिकांश रसोइयों की हालत लगभग ऐसी ही है। कोई दूसरों से उधार लेकर परिवार की गाड़ी खींच रहा है तो कोई रिश्तेदारों की मदद से जिले के सभी 14 ब्लॉक में कुल 2476 परिषदीय विद्यालय हैं। इनमें करीब तीन लाख बच्चे अध्ययनरत हैं। इन्हें मिड-डे- मील परोसने के लिए 4901 सरोइयों की तैनाती की गई है। रसोइयां बच्चों का भोजन पकाने के साथ ही साफ सफाई में भी सहयोग करती हैं। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान बनकटी ब्लॉक क्षेत्र की एक रसोइया महीने घर चलाया, लेकिन अब जब स्कूल बंद थे तो इन्हें मानदेय ने कहा कि उसे महज 1500 रुपये उधार भी लें तो किस उम्मीद पर मिलना भी बंद हो गया। जुलाई से स्कूल खुलने पर रसोइयों ने इस उम्मीद से अपना काम संभाल लिया कि देर-सबेर उन्हें मानदेय मिल जाएगा, लेकिन इस उम्मीद की डोर थामे छह महीने का समय गुजर गया। सातवां महीना भी बीतने को है, लेकिन मानदेय बताया कि मानदेय मिलने की उम्मीद का भुगतान होता नहीं दिख रहा। में उधार लेकर किसी तरह चार मानदेय मिलता है। इससे किसी तरह घर का खर्च चलाती है, लेकिन अब वह भी नहीं मिल रहा। दिन पर दिन स्थिति खराब होती जा रही है। समझ में नहीं आ रहा वक्त कैसे कटेगा।


भानपुर क्षेत्र की एक रसोइया ने बताया मानदेय मिलने की उम्मीद मे  किसी तरह 4 महीने घर खर्च चलाया लेकिन अब उधर भी ले तो किस उम्मीद पर क्षेत्र की एक अन्य रसोइये ने कहा कि घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं।कभी कुछ खाने की जिद करते हैं। वह भी पूरा नहीं हो पाता। अब एक मां के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि बच्चा भूखा हो और वह म उसे खाने को कुछ न दे पाए। सवाद

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