'वशिष्ठ नहीं होते तो राम नहीं होते, संदीपन नहीं होते तो घनश्याम नहीं होते।' 'गीली मिट्टी अनगढ़ी हमको गुरूवर जान ज्ञान प्रकाशित कर दीजिए आप समर्थ बलवान।' शिक्षकों की सामर्थ्य का परिचय कराती इन लाइनों को बचपन से पढ़ते हुए मैं बड़ा हुआ और अपने शिक्षकों से प्रेरित होकर परिषदीय स्कूलों में शिक्षक बना।
जी हां, मैं शिक्षक हूं। सोचा था स्कूल पहुंचूंगा तो वहां अपने देश के लिए नगीने मढूगां, भगत, आजाद और गांधी को गढूगां। स्कूल पहुंचा तो नजारा ही दूसरा था। गांव के बच्चों के मैले कुचैले बच्चों और उनके माता पिता के लिए शिक्षा प्राथमिकता में ही नहीं थी। सारा बोझ हमारे ऊपर। बच्चों को साफ सुथरा बनाने, घर से बुलाने, खाना खिलाने, पढ़ाने व पाठ याद कराना सब हमारी जिम्मेदारी । स्कूलों में न तो सफाईकर्मी और न ही चपरासी । गए थे शिक्षक बनने लेकिन हम स्कूलों में सफाईकर्मी, चपरासी, क्लर्क, माली, ठेकेदार और रसोई संभालने तक का जिम्मा मुफ्त में मिल गया।
हर रोज मांगी जाने वाली दर्जनों सूचनाओं को तैयार करना और चंद रूपयों वाले बैंक खातों का खाता बही बनाने के साथ दूसरे गैर शैक्षणिक कार्यों को संभालना भी हमारी जिम्मेदारी। बार बार मांगी जाने वाली सूचनाओं से मैं पोस्ट मैन बन गया, मेरे दिन रात का चैन चला गया। अब मेरे भीतर का शिक्षक न जाने कहां खो गया। मेरी सिर्फ इतनी ही पीड़ा नहीं है। वन मैन आर्मी मानने वाला मेरा विभाग मेरे वेतन, एरियर और प्रमोशन के लिए कितना इंतजार कराता है, यह मेरा दिल ही जानता है।
साहब को अपनी एसीपी में देरी नहीं चाहिए लेकिन मेरा प्रमोशन उनकी फाइलों में ही कराह रहा है। इतना करने और पीड़ा सहने के बावजूद समाज में मुझे खलनायक के तौर पर पेश किया गया है। मेरे विभाग के अलावा प्रशासन, राजस्व, विकास और पंचायतीराज समेत अन्य विभाग व अब 'प्रेरणा' व डायल 1000 मेरी निगरानी को लगाए गए हैं जैसे अब मैं शिक्षक नहीं, चोर हो गया हूं। 'साहब' अगर मैं चोर और नकारा होता तो आप का वजूद ही न होता।

