आँकड़ों के जंगल में खो चुका है क्या शिक्षक ?”
एक *शिक्षक* की सबसे बड़ी हार क्या होती है?
वह हार तब होती है
जब वह आलोचना भी नहीं कर पाता
उस सिस्टम की,
जिसके सामने उसे रोज़ सिर झुकाकर
किसी न किसी सरकारी पोर्टल पर
डेटा अपलोड करना होता है।
लोग कहते हैं —
“सरकार आपसे काम ले रही है,
तो दिक्कत क्या है?”
पर शायद उन्हें यह नहीं दिखता कि
काम नहीं…
दबाव बढ़ रहा है।
एक तरफ कक्षा में
बच्चों की आँखों में भविष्य पलता है,
और दूसरी तरफ स्क्रीन पर
टारगेट, कॉलम,
लिंक और डेडलाइन।
कभी सर्वे,
कभी पोर्टल,
कभी रिपोर्ट,
कभी फोटो अपलोड।
और अगर एक भी कॉलम खाली रह गया —
तो शिक्षक ही दोषी!
न कोई पूछता है
कि बच्चों को आपने क्या सिखाया,
न कोई देखता है
कि आपने किस बच्चे का डर मिटाया।
सब कुछ सिमट कर
एक एक्सेल शीट में बदल गया है।
जहाँ
संवेदनाएँ नहीं होतीं,
सिर्फ़ संख्या होती है।
एक शिक्षक आज
ब्लैकबोर्ड से ज़्यादा
डैशबोर्ड देख रहा है।
वह चॉक से ज़्यादा
कीबोर्ड पर जूझ रहा है।
और सबसे दर्दनाक बात यह है कि —
वह चुप है।
क्योंकि
जिसके सामने उसे हर शाम
डेटा सबमिट करना है,
उसके सामने
वह अपनी पीड़ा भी सबमिट नहीं कर सकता।
हम काम से नहीं डरते,
हम अन्यायपूर्ण बोझ से थकते हैं।
हम पढ़ाने आए थे,
फ़ाइलों में उलझने नहीं।
हम भविष्य गढ़ने निकले थे,
न कि आँकड़ों में खो जाने।
शिक्षक मशीन नहीं है।
वह समाज की आत्मा है।
अगर आत्मा ही थक जाएगी,
तो पीढ़ियाँ कैसे चलेंगी?
✍️ एक प्राथमिक शिक्षक की कलम से
