यूपी के इस जिले में अगले दो दिन 22 व 23 को 12वीं तक के स्कूल बंद, डीएम ने जारी किया आदेश
यूपी के वाराणसी में नवरात्र के कारण लगातार छुट्टी के बाद बुधवार को ही खुले स्कूल एक बार फिर अगले दो दिनों के लिए बंद कर दिए गए हैं। जिलाधिकारी (डीएम) की तरफ से स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया गया है। आदेश में कहा गया है कि नाटीइमली के भरत मिलाप और एमएलसी चुनाव के कारण दो दिन छुट्टी रहेगी। डीएम के निर्देश पर डीआईओएस और बीएसए की तरफ से जारी एक संयुक्त आदेश में 22 और 23 अक्तूबर को सभी स्कूलों में छुट्टी करने का आदेश दिया है।
संयुक्त आदेश में 22 अक्तूबर को नाटीइमली के भरत मिलाप की स्थानीय छुट्टी और 23 अक्तूबर को एमएलसी चुनाव के मतदान को देखते हुए अवकाश का आदेश दिया गया है। यह आदेश प्री-प्राइमरी से कक्षा-12वीं तक के परिषदीय, माध्यमिक, सीबीएसई, आईसीएसई और यूपी बोर्ड के सभी सरकारी, अर्ध सरकारी और निजी विद्यालयों पर लागू रहेगा। डीआईओएस भोलेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि आदेश की अनदेखी करने वाले स्कूलों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाएगी।
आज भी एयरशो देखने का मिला मौका
वाराणसी में 22 अक्टूबर यानी गुरुवार से ही एयर शो भी शुरू हो रहा है। यह एयर शो 22, 24 और 25 अक्टूबर को होगा। अभी तक केवल 25 अक्टूबर को ही रविवार होने के कारण छुट्टी का दिन था। अब 22 को भी छुट्टी होने से दो दिन बच्चे एयर शो का लुत्फ उठा सकेंगे। वाराणसी के लोगों को पहले बार इतने बड़े एयर शो को देखने का मौका मिल रहा है। सौ से ज्यादा लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर तीन दिनों तक गंगा के ऊपर नमो घाट से अस्सी घाट के बीच करतब दिखाएंगे। अंतिम दिन रविवार को खुद पीएम मोदी भी मौजूद रहेंगे।
नाटी इमली के भरत मिलाप की सैकड़ों साल पुरानी है परंपरा
वाराणसी के भरत मिलाप की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। काशी के महाराज का भी इससे जुड़ाव है। श्रीचित्रकूट रामलीला समिति की भरत मिलाप लीला से काशिराज परिवार के रिश्ते को इस वर्ष 22 अक्तूबर को 229 साल पूरे हो जाएंगे। वर्ष 1796 में तत्कालीन महाराजा उदित नारायण सिंह ने भरत मिलाप की लीला में प्रतिवर्ष आने की परंपरा की नींव डाली थी। 229वें वर्ष में काशीराज के प्रतिनिधि कुंवर अनंतनारायण सिंह उपस्थित होंगे।
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श्रीचित्रकूट की रामलीला में काशिराज परिवार के सदस्यों की सहभागिता महाराज उदितनारायण सिंह के जमाने में शुरू हुई। बतौर राजा उनके आगमन की शुरुआत सन 1796 में उनके गद्दी पर बैठने के बाद से हुई थी। 1814 तक वह राजगद्दी पर रहे। उनके बाद काशी की राजगद्दी पर बैठने वाले सभी राजाओं ने इस परंपरा का निर्वाह किया। इस परंपरा को सर्वाधिक गरिमा काशीनारेश डॉ. विभूतिनारायण सिंह के दौर में मिली। काशीवासियों के बीच महादेव की भांति मान्य राजा विभूतिनारायण सिंह ने जिस निष्ठा और आस्था के साथ भरत मिलाप की लीला में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, उसे देख कर दूरदराज से आने वाले लोगों को भ्रम हो जाता था कि नाटी इमली की भरत मिलाप की लीला रामनगर की रामलीला से जुड़ी है।

