जाति आधारित जनगणना को विश्वसनीय बनाना होगा
भारत में हर दस साल पर होने वाली जनगणना इस बार छह साल की देरी से 2027 में होने जा रही है। इसके नतीजों का बेसब्री से इंतजार है। जनगणना ही एकमात्र ऐसा डेटाबेस है, जिसमें ग्रामीण और शहरी इलाकों के वार्ड तक की विस्तृत जानकारी इकट्ठा की जाती है। यह नीति-निर्माताओं के लिए उपयोगी है, साथ ही गरीबों के लिए चलाई जा रही कई ऐसी योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिनके लिए बजट आवंटन जनसंख्या के आधार पर होता है। यह भारत की सांख्यिकीय प्रणाली की नींव है, जो राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के सर्वेक्षणों के लिए 'सैंपलिंग फ्रेम' का काम करती है।
इस बार की जनगणना की खासियत यह है कि 1931 के बाद पहली बार देश में जाति आधारित गणना की जाएगी। जाति जनगणना का उत्तरदायित्व संविधान के अनुच्छेद 16(4) व अनुच्छेद 340 के तहत अनुसूचित जातियों (एससी) व अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण के प्रावधान से पैदा होती है। इन अनुच्छेदों में एससी-एसटी सूचियों में शामिल नहीं की गई पिछड़ी जातियों के आंकड़े जुटाने व उनके विश्लेषण के प्रावधान किए गए हैं। हालाँकि यह जाति गणना की मांग 1957 से चली आ रही थी। हालाँकि, साफ नहीं है कि यह डेटा कैसे इकट्ठा किया जाएगा। वैसे, जाति संबंधी आंकड़े इकट्ठा करना मुश्किल काम है, क्योंकि उम्र, लिंग, धर्म, शिक्षा व पेशे के उलट इसमें मानक परिभाषाओं और वर्गों का इस्तेमाल होता है।
राष्ट्रीय स्तर पर जाति संबंधी आंकड़े इकट्ठा करने की आखिरी कोशिश वर्ष 2011 की 'सामाजिक-आर्थिक एवं जाति गणना (एसईसीसी)' में की गई थी। हालाँकि, एसईसीसी के आंकड़े ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इकट्ठा किए थे, जबकि जनगणना 'सेंसस एक्ट' के तहत भारत के महानिबंधक करवाते हैं। इसके साथ समस्या यह रही कि जानकारी विस्तृत से किए गए सवाल-जवाब के जरिए इकट्ठी की गई, जिससे हजारों जातियों के नाम और उनके अलग-अलग रूप सामने आए। यही वजह है कि बिहार, तेलंगाना और कर्नाटक की सरकारों ने अपने यहां की जाति गणना (जाति सर्वेक्षण) में पहले से मौजूद जाति-सूची का इस्तेमाल किया, ताकि सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में सटीक जानकारी मिल सके। बिहार में 215 जातियों की सूची है, तो वहीं तेलंगाना की सूची में 242 जातियां हैं। अबकी जनगणना में घरों का सर्वेक्षण 30 सितंबर तक पूरा होने की उम्मीद है। आबादी की गिनती दो चरणों में होगी, जिसमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की पहली प्रक्रिया सितंबर से शुरू होगी, जबकि बाकी राज्यों में यह प्रक्रिया बाद में होगी। जनगणना में किस तरह का डेटा इकट्ठा किया जाएगा, इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। इससे इसकी गंभीरता पर सवाल उठते हैं।
जातियों की एक सूची बनाई जाए और जनगणना शुरू होने से पहले उसे सार्वजनिक चर्चा के लिए देश के सामने रखा जाए।
अलग-अलग लोगों और समुदायों के लिए जाति का मतलब अलग-अलग होता है। इसलिए, इस विविधता को देखते हुए, अगर कोई खुला सवाल पूछा जाता है, तो विश्लेषण के मकसद से वह निश्चित साबित नहीं हो सकता है। एसईसीसी के समय यही हुआ था।
दूसरी ओर, पहले से तय सूची से अनुमान मिल सकते हैं, मगर इस्तेमाल की जाने वाली सूची को अंतिम रूप देने के लिए व्यापक चर्चा की जरूरत है। बिहार और तेलंगाना के मामले में यह काम नागरिकों, बौद्धिकों और जातियों से मिले फीडबैक व चर्चा की खुली प्रक्रियाओं के जरिए किया गया था। राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रक्रिया में अलग-अलग राज्यों से भी जानकारी इकट्ठा करने की जरूरत है, क्योंकि लोगों की आवाजाही बढ़ रही है और प्रवासी एक अहम समुदाय बन गए हैं। जातियों का बदलता स्वरूप और उनके समाजशास्त्रीय अर्थ ऐसे पहलू हैं, जिनके लिए समय और व्यापक सहमति की जरूरत है।
इसीलिए, सही तरीका यही कि जातियों की एक सूची बनाई जाए और जनगणना शुरू होने से पहले उसे सार्वजनिक चर्चा और जांच-पड़ताल के लिए देश के सामने रखा जाए। इससे जाति वर्गीकरण से जुड़े विवादित मुद्दों को सुलझाने में मदद मिलेगी और जनगणना प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

