48 साल के दबदबे के बाद शर्मा गुट का सियासी अध्याय समाप्त
ओपी शर्मा के निधन के बाद बिखरा संगठन; प्रमुख चेहरे भाजपा के पाले में पहुंचे
लखनऊ, उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति में करीब पाँच दशकों तक एकछत्र राज करने वाले माध्यमिक शिक्षक संघ (शर्मा गुट) का राजनीतिक प्रभाव अब पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुँच गया है। संगठन के सर्वसर्वा ओम प्रकाश शर्मा के निधन के बाद से शुरू हुआ बिखराव अब अंतिम पड़ाव पर नजर आ रहा है, क्योंकि गुट के बचे हुए प्रमुख नेताओं को भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी मैदान में उतार दिया है।
1970 से शुरू हुआ था 48 वर्षों का सफर
ओम प्रकाश शर्मा पहली बार वर्ष 1970 में विधान परिषद पहुंचे थे। वे लगातार 48 वर्षों तक मेरठ शिक्षक निर्वाचन सीट से एमएलसी रहे और शिक्षक राजनीति की सबसे मजबूत धुरी बने रहे। एक दौर में उत्तर प्रदेश की कई शिक्षक व स्नातक विधान परिषद सीटों पर केवल शर्मा गुट का ही एकछत्र दबदबा रहता था।
2020 के चुनाव से लगी थी सेंध
वर्ष 2020 के विधान परिषद चुनाव में भाजपा ने व्यापक स्तर पर शिक्षक निर्वाचन सीटों पर उतरकर शर्मा गुट के वर्चस्व को खुली चुनौती दी। इसी चुनाव में ओपी शर्मा को मेरठ सीट पर भाजपा के श्रीचंद शर्मा से पराजय का सामना करना पड़ा, जिसके बाद संगठन का राजनीतिक दायरा लगातार सिमटता चला गया।
ओपी शर्मा के बाद भाजपा की ओर बढ़ा झुकाव
ओपी शर्मा के निधन के बाद सुरेश कुमार त्रिपाठी को संगठन की कमान सौंपी गई और बाद में प्रमोद कुमार मिश्रा कार्यकारी अध्यक्ष बने। इस दौरान गुट के प्रमुख नेताओं का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ता गया।
अब भाजपा ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से शर्मा गुट के पूर्व एमएलसी रहे ध्रुव कुमार त्रिपाठी और वाराणसी सीट से डॉ. प्रमोद मिश्रा को अपना अधिकृत उम्मीदवार घोषित कर दिया है। प्रमुख नेताओं के भाजपा में शामिल होकर प्रत्याशी बनने के साथ ही शर्मा गुट का 48 वर्ष पुराना स्वतंत्र राजनीतिक वर्चस्व पूरी तरह खत्म माना जा रहा है।

