ऑनलाइन ठगी रोकने के लिए ओटीपी में बदलाव की तैयारी, यह जानकारी हो सकती है अनिवार्य
ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन खरीदारी के दौरान होने वाली साइबर ठगी पर अंकुश लगाने के लिए ट्राई ओटीपी यानी वन टाइम पासवर्ड वाले एसएमएस का प्रारूप एक जैसा करने पर विचार कर रहा है।
फिलहाल अलग-अलग बैंक, ई-कॉमर्स कंपनियां और डिजिटल सेवाएं अपने हिसाब से ओटीपी संदेश भेजती हैं। इससे कई बार उपभोक्ताओं के लिए असली और फर्जी संदेश के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य ओटीपी संदेशों को पहचानना आसान बनाना और उनके दुरुपयोग की आशंका कम करना है।
मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, ट्राई ने दूरसंचार कंपनियों के साथ इस प्रस्ताव पर कई बैठकों में चर्चा की है। नियामक इस संबंध में परामर्श पत्र भी जारी कर सकता है। हालांकि, अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यानी फिलहाल ओटीपी संदेशों के प्रारूप में बदलाव का कोई नया नियम लागू नहीं हुआ है।
क्या नए नियम से पूरी तरह रुक जाएगी ठगी?
ओटीपी संदेशों का प्रारूप एक जैसा करने से उपभोक्ताओं को फायदा हो सकता है, लेकिन इससे साइबर ठगी पूरी तरह खत्म नहीं होगी। टेक कंपनी टेकआर्क के मुख्य विश्लेषक फैसल कावूसा के मुताबिक, ठग भी ऐसे संदेशों की नकल कर सकते हैं। ट्राई के पूर्व प्रमुख सलाहकार सत्य एन. गुप्ता के मुताबिक, संदेशों के मानकीकरण से नुकसान नहीं है, लेकिन तकनीकी व्यवस्था में ज्यादा हस्तक्षेप से कंपनियों की लागत और तकनीकी जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
साइबर ठगी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी
सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत साइबर अपराध के बढ़ते मामलों से भी समझी जा सकती है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें 2021 में 2.62 लाख थीं, जो 2025 में बढ़कर 24.02 लाख हो गईं। इसी अवधि में इन शिकायतों में शामिल रकम 551 करोड़ रुपये से बढ़कर 22,495 करोड़ रुपये हो गई। हालांकि, ये आंकड़े सभी तरह की वित्तीय साइबर धोखाधड़ी से संबंधित हैं।
पहले से लागू हैं सुरक्षा के लिए कई उपाय
कंपनियों और बैंकों को संदेश भेजने के लिए निर्धारित पंजीकरण और टेम्पलेट संबंधी नियमों का पालन करना होता है। संदेशों की पहचान के लिए व्यवस्था भी लागू है। नवंबर 2025 में ट्राई ने एसएमएस के प्रारूप में इस्तेमाल होने वाले बदलने योग्य हिस्सों, जैसे वेबसाइट लिंक, ऐप डाउनलोड लिंक और संपर्क नंबर, को पहले से चिह्नित करने के निर्देश दिए थे।
क्या सावधानी बरतें?
नया प्रस्ताव लागू होने तक भी उपभोक्ताओं को कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। किसी अनजान व्यक्ति के साथ ओटीपी साझा न करें। बैंक या ग्राहक सेवा अधिकारी बनकर फोन करने वाले व्यक्ति को भी ओटीपी न बताएं। किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करके बैंकिंग जानकारी न भरें। यदि बिना किसी अनुरोध के ओटीपी आता है, तो अपने बैंक खाते और हाल के लेनदेन की जांच करें।
कुछ जानकारियां देने की बाध्यता संभव
● ओटीपी का उद्देश्य: कोड किस काम के लिए भेजा गया है, जैसे लॉगिन, भुगतान या लेनदेन की पुष्टि।
● भेजने वाली कंपनी की पहचान: संदेश किस बैंक, कंपनी की ओर से भेजा गया है।
● वैधता की अवधि: ओटीपी कितनी देर तक इस्तेमाल किया जा सकता है।
● संदेश में कोड की दृश्यता: मोबाइल स्क्रीन पर संदेश को साइड से देख सकने पर रोक जैसे उपाय भी हो सकते हैं।
पहले से लागू हैं सुरक्षा के लिए कई उपाय
कंपनियों और बैंकों को संदेश भेजने के लिए निर्धारित पंजीकरण और टेम्पलेट संबंधी नियमों का पालन करना होता है। संदेशों की पहचान के लिए व्यवस्था भी लागू है। नवंबर 2025 में ट्राई ने एसएमएस के प्रारूप में इस्तेमाल होने वाले बदलने योग्य हिस्सों, जैसे वेबसाइट लिंक, ऐप डाउनलोड लिंक और संपर्क नंबर, को पहले से चिह्नित करने के निर्देश दिए थे।
नई दिल्ली, हिन्दुस्तान ब्यूरो। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन खरीदारी के दौरान होने वाली साइबर ठगी पर अंकुश लगाने के लिए ट्राई ओटीपी यानी वन टाइम पासवर्ड वाले एसएमएस का प्रारूप एक जैसा करने पर विचार कर रहा है।
फिलहाल अलग-अलग बैंक, ई-कॉमर्स कंपनियां और डिजिटल सेवाएं अपने हिसाब से ओटीपी संदेश भेजती हैं। इससे कई बार उपभोक्ताओं के लिए असली और फर्जी संदेश के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य ओटीपी संदेशों को पहचानना आसान बनाना और उनके दुरुपयोग की आशंका कम करना है।
मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, ट्राई ने दूरसंचार कंपनियों के साथ इस प्रस्ताव पर कई बैठकों में चर्चा की है। नियामक इस संबंध में परामर्श पत्र भी जारी कर सकता है। हालांकि, अभी इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यानी फिलहाल ओटीपी संदेशों के प्रारूप में बदलाव का कोई नया नियम लागू नहीं हुआ है।
क्या नए नियम से पूरी तरह रुक जाएगी ठगी?
ओटीपी संदेशों का प्रारूप एक जैसा करने से उपभोक्ताओं को फायदा हो सकता है, लेकिन इससे साइबर ठगी पूरी तरह खत्म नहीं होगी। टेक कंपनी टेकआर्क के मुख्य विश्लेषक फैसल कावूसा के मुताबिक, ठग भी ऐसे संदेशों की नकल कर सकते हैं। ट्राई के पूर्व प्रमुख सलाहकार सत्य एन. गुप्ता के मुताबिक, संदेशों के मानकीकरण से नुकसान नहीं है, लेकिन तकनीकी व्यवस्था में ज्यादा हस्तक्षेप से कंपनियों की लागत और तकनीकी जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
साइबर ठगी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी
सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत साइबर अपराध के बढ़ते मामलों से भी समझी जा सकती है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर दर्ज वित्तीय धोखाधड़ी की शिकायतें 2021 में 2.62 लाख थीं, जो 2025 में बढ़कर 24.02 लाख हो गईं। इसी अवधि में इन शिकायतों में शामिल रकम 551 करोड़ रुपये से बढ़कर 22,495 करोड़ रुपये हो गई। हालांकि, ये आंकड़े सभी तरह की वित्तीय साइबर धोखाधड़ी से संबंधित हैं।

