आरक्षित अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग से बाहर नहीं रख सकते: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि जब स्क्रीनिंग परीक्षा के अंक अंतिम मेरिट में जोड़े जाते हैं, तब आरक्षित वर्ग के उच्च अंक पाने वाले अभ्यर्थियों को सिर्फ अंतिम चयन के समय सामान्य वर्ग में समायोजित करने की व्यवस्था उचित नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मेरिट के आधार पर सामान्य वर्ग में समायोजन प्रारंभिक चरण में भी किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति राजन रॉय व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने भावना यादव व छह अन्य की ओर से दाखिल विशेष अपील स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। साथ ही, यूपी लोक सेवा आयोग के 9 जनवरी 2020 के कार्यालय ज्ञापन तथा भर्ती विज्ञापन की संबंधित शर्त को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने आयोग को तीन माह के भीतर संबंधित कार्यालय ज्ञापन की समीक्षा करने और राज्य सरकार को भी इस संबंध में स्पष्ट नीति बनाने का आदेश दिया है।
2020 का कार्यालय ज्ञापन सभी भर्तियों पर एक समान लागू नहीं हो सकता: हाईकोर्ट ने पाया कि 9 जनवरी 2020 के कार्यालय ज्ञापन में आरक्षित वर्ग से अनारक्षित वर्ग में समायोजन का सिद्धांत सिर्फ अंतिम चयन के चरण पर लागू करने की सामान्य व्यवस्था कर दी गई थी। इसमें भर्ती की प्रकृति, लागू नियमों और स्क्रीनिंग परीक्षा के अंकों की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार नहीं किया गया जबकि अलग-अलग भर्तियों की शर्तें और नियम अलग हो सकते हैं।
यदि किसी भर्ती में प्रारंभिक परीक्षा के अंक अंतिम मेरिट में शामिल नहीं होते, तो स्थिति अलग हो सकती है लेकिन जहां ये अंक अंतिम चयन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, वहां समायोजन को सिर्फ अंतिम चरण तक सीमित रखने वाला एक समान नियम उचित नहीं है।
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 की धारा 3(6) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि मेरिट के आधार पर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का अनारक्षित वर्ग में समायोजन सिर्फ अंतिम चयन के समय ही किया जा सकता है।
स्क्रीनिंग परीक्षा केवल छंटनी का माध्यम नहीं
मामला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के पदों पर सीधी भर्ती से संबंधित है। आयोग के 22 दिसंबर 2025 के विज्ञापन के अनुसार अंतिम मेरिट सूची स्क्रीनिंग परीक्षा के 75 प्रतिशत और साक्षात्कार के 25 प्रतिशत अंकों को जोड़कर तैयार की जानी थी। आयोग की दलील थी कि स्क्रीनिंग परीक्षा का उद्देश्य मुख्य परीक्षा अथवा साक्षात्कार के लिए अभ्यर्थियों की छंटनी करना है। लिहाजा इस चरण पर आरक्षित और अनारक्षित वर्ग की अलग-अलग सूचियां तैयार की जा सकती हैं तथा आरक्षित वर्ग के उच्च अंक प्राप्त अभ्यर्थियों का सामान्य वर्ग में समायोजन अंतिम चयन के समय किया जा सकता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि जब स्क्रीनिंग परीक्षा के अंक अंतिम चयन में 75 प्रतिशत योगदान देते हैं, तो उसे महज छंटनी की परीक्षा नहीं कहा जा सकता। ऐसे में स्क्रीनिंग परीक्षा में प्राप्त अंकों का अंतिम मेरिट पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के रजत यादव तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट के नितिन कुमार मामले में दिए गए निर्णयों का उदाहरण देते दिया। कहा कि, उपयुक्त परिस्थितियों में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों का सामान्य वर्ग में समायोजन प्रारंभिक या स्क्रीनिंग परीक्षा के स्तर पर भी किया जा सकता है, विशेष रूप से ऐसी भर्ती में, जहां स्क्रीनिंग परीक्षा के अंक अंतिम चयन में जोड़े जाते हैं, वहां उसे सामान्य वर्ग की मेरिट सूची से बाहर रखना उचित नहीं होगा।
