मातृभाषा में अखबार न पढ़ पाना बेहद चिंताजनक
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए चिकित्सीय परीक्षण के आधार पर युवती को बालिग मानते हुए उसे अपने पति के साथ जाने की अनुमति दे दी। साथ ही भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं, अशिक्षा और गरीबी के मद्देनजर पॉक्सो एक्ट के अत्यधिक कठोर और अक्षरशः अनुपालन पर गंभीर चिंता व्यक्त की और विधि आयोग से कानून में आवश्यक संशोधनों पर विचार करने का आग्रह किया। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने 5वीं तक पढ़ी युवती से बातचीत की तो उसने बताया कि वह हिंदी का अखबार भी नहीं पढ़ सकती और केवल अपना नाम लिख सकती है। युवती के मजदूर पिता ने भी खुद को निरक्षर बताया।
इस पर खंडपीठ ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि X5वीं तक पढ़ने के बावजूद मातृभाषा में अखबार न पढ़ पाना बेहद चिंताजनक है। Xसरकार यह सुनिश्चित करने में विफल क्यों रही कि बच्ची कम से कम 12वीं तक अपनी पढ़ाई जारी रखे। Xजमीनी हकीकत यह है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा अशिक्षा और गरीबी के कारण कानून व संवैधानिक अधिकारों
से अनभिज्ञ है। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने राकेश यादव उर्फ पप्पू एवं अन्य की याचिका पर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि किशोरावस्था के स्वाभाविक आकर्षण और सामाजिक अज्ञानता के मामलों में पॉक्सो कानून का शाब्दिक और कठोर क्रियान्वयन न्याय के बजाय अन्याय का कारण बन सकता है। ऐसे मामलों में यदि पति को लंबी जेल की सजा हो जाती है तो पत्नी और नवजात शिशु के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अधर में लटक जाएगी और परिवार बिखर जाएगा।
कोर्ट ने विधि आयोग को आदेश की कॉपी भेजते हुए आग्रह किया कि विशेष न्यायाधीशों को ऐसे असाधारण मामलों में परिस्थितियों के अनुसार सजा तय करने का न्यायिक विवेक दिया जाए। Xसमुदाय सेवा जैसी वैकल्पिक सजाओं के प्रावधानों पर विचार किया जाए ताकि नाबालिगों के संरक्षण के नाम पर बने कानून से अज्ञानतावश बने परिवारों को टूटने से बचाया जा सके।

