नौकरी छिपाने पर भरण-पोषण का आदेश रद्द
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बागपत की फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए पांच हजार रुपये प्रतिमाह के भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने मनोज कुमार राना की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए दिया है। पत्नी नौकरी कर रही थी और यह तथ्य छिपाकर भरण-पोषण मांगा था।
मनोज कुमार राना का विवाह 15 मार्च 2021 को प्रीति (प्रीति पुंडीर) से हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। प्रीति ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत 20 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की थी। बागपत की फैमिली कोर्ट ने पांच हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका की थी। पति का कहना था कि पत्नी नोएडा की निम्बस एडकॉम प्राइवेट लिमिटेड में सेल्स मैनेजर के पद पर कार्यरत है और करीब 40 हजार रुपये प्रतिमाह कमाती है। उसने यह भी कहा कि पत्नी स्वतंत्र रहना चाहती है और उसने पति व उसके भाई के खिलाफ नोएडा में झूठी एफआईआर दर्ज कराई है। पति ने बताया कि कोविड लॉकडाउन में उसकी नौकरी छूट गई थी और वह बेरोजगार है। पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसके अनुसार विवाह में करीब 10 लाख खर्च हुए लेकिन ससुराल पक्ष कम दहेज से नाखुश था। उसने कहा कि वह 2017 से 2022 तक नौकरी में थी और 30 जून 2022 को इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के समर्थन में उसने एक जुलाई 2022 का कंपनी का रिलीविंग लेटर पेश किया।
हाईकोर्ट ने पत्नी के बयानों और दस्तावेजों में कई विरोधाभास पाए। ट्रायल कोर्ट में पत्नी ने कहा कि उसने शादी के 5-6 महीने बाद नौकरी छोड़ी जबकि उसके अपने रिलीविंग लेटर के अनुसार उसने 30 जून 2022 तक काम किया। जिरह में उसने कहा कि उसने नौकरी छोड़ी, पर इस्तीफा नहीं दिया और इस्तीफे वाले पत्र पर अपने हस्ताक्षर से इनकार किया। पति की ओर से दाखिल दस्तावेजों में कंपनी की ओर से 20 नवंबर 2022 की जन्मदिन की शुभकामनाएं और 16 अगस्त को 6 वर्ष व 16 अगस्त 2025 को 8 वर्ष पूरे होने पर बधाई पत्र थे। कोर्ट ने कहा कि इससे साबित होता है कि वह इस्तीफे की तारीख के बाद भी कंपनी में सेल्स मैनेजर के रूप में कार्यरत है। पत्नी का 13 नवंबर 2021 का एक पत्र भी रिकॉर्ड में आया, जिसमें उसने कहा था कि वह पति के साथ नहीं रहना चाहती और तलाक चाहती है। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय में आने वाले पक्षकार को स्वच्छ हृदय और साफ उद्देश्य के साथ आना चाहिए और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने वाले का मामला गुण-दोष पर विचार योग्य नहीं रहता। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी ने अपनी नौकरी और आय जैसा महत्वपूर्ण तथ्य ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों से छिपाया। उसका आचरण साफ हाथों और ईमानदार नीयत से न्यायिक प्रक्रिया शुरू करने वाले व्यक्ति जैसा नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि वह पति से किसी भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

