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Monday, September 21, 2026

हर गलती का जिम्मेदार शिक्षक ही क्यों? सरकारी स्कूलों में कार्रवाई के बदलते पैमाने पर बड़ा सवाल

हर गलती का जिम्मेदार शिक्षक ही क्यों? सरकारी स्कूलों में कार्रवाई के बदलते पैमाने पर बड़ा सवाल


सरकारी स्कूलों में किसी भी तरह की अव्यवस्था सामने आते ही कार्रवाई का सबसे आसान रास्ता क्या है? कई बार ऐसा लगता है—जिम्मेदारी तय करने से पहले शिक्षक को जिम्मेदार ठहरा दो।




MDM में गड़बड़ी—शिक्षक सस्पेंड!




स्कूल में सफाई की समस्या—शिक्षक सस्पेंड!




छत जर्जर या गिर गई—शिक्षक सस्पेंड!




बच्चों की उपस्थिति कम—शिक्षक सस्पेंड!




बच्चे ड्रेस में नहीं आए—शिक्षक सस्पेंड!




शिक्षक की कहीं दूसरी जगह ड्यूटी लगा दी गई—फिर भी शिक्षक सस्पेंड!




नामांकन कम हुआ—तो भी शिक्षक पर कार्रवाई!




सवाल यह नहीं है कि शिक्षक की गलती होने पर कार्रवाई क्यों की जाती है। कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या हर मामले में वास्तविक जिम्मेदारी तय करने से पहले ही शिक्षक को दोषी मान लेना उचित है?




वायरल खबरों की दौड़ में सबसे आसान निशाना शिक्षक




आज सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के दौर में खबर को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की होड़ है। सरकारी विद्यालय और प्राथमिक शिक्षक इस दौड़ में कई बार आसान Target बन जाते हैं।




कैमरा उठाइए, विद्यालय पहुंचिए, कुछ सवाल पूछिए, मौके की कुछ तस्वीरें लीजिए और फिर खबर तैयार—




“स्कूल में बड़ी लापरवाही, शिक्षक पर गिरी गाज!”




लेकिन किसी घटना के पीछे की पूरी व्यवस्था को समझने के लिए जरूरी सवाल अक्सर पीछे छूट जाते हैं।




क्या विद्यालय में सफाई कर्मचारी उपलब्ध है?




क्या MDM की व्यवस्था के लिए निर्धारित संसाधन समय पर मिल रहे हैं?




क्या जर्जर भवन की सूचना विभाग को पहले ही दी जा चुकी थी?




ड्रेस की धनराशि और वितरण की प्रक्रिया क्या है?




बच्चों की अनुपस्थिति के वास्तविक कारण क्या हैं?




क्या शिक्षक को उसी समय किसी अन्य सरकारी कार्य में लगाया गया था?




इन सवालों के जवाब तलाशने के बाद ही किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी तय करना ज्यादा उचित होगा।




बच्चों की अनुपस्थिति का कारण सिर्फ शिक्षक नहीं




सरकारी विद्यालयों में बच्चों की कम उपस्थिति भी एक गंभीर विषय है। लेकिन इसके पीछे केवल शिक्षक की लापरवाही मान लेना वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा।




ग्रामीण क्षेत्रों में कई बच्चे परिवार के साथ खेती-किसानी के काम में हाथ बंटाते हैं। कभी धान-गेहूं की फसल का मौसम होता है, कभी आम या आलू की खेती का काम। कभी परिवार में शादी-ब्याह होता है तो कभी किसी रिश्तेदार के यहां जाना पड़ता है।




बच्चों की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियां उनकी उपस्थिति को प्रभावित करती हैं।




इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि शिक्षक की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। शिक्षक को बच्चों को नियमित विद्यालय लाने के लिए प्रयास करने चाहिए। लेकिन हर अनुपस्थिति को केवल शिक्षक की विफलता मानना भी पूरी तस्वीर नहीं है।




जर्जर भवन की जिम्मेदारी किसकी?




मान लीजिए किसी विद्यालय की छत या भवन लंबे समय से जर्जर है। शिक्षक ने इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को दे दी। इसके बावजूद समय पर मरम्मत नहीं हुई और बाद में कोई हादसा हो गया।




ऐसी स्थिति में यह जांचना जरूरी है कि—




शिक्षक ने समय पर सूचना दी थी या नहीं?




विद्यालय स्तर पर क्या कार्रवाई संभव थी?




संबंधित विभाग को सूचना कब मिली?




मरम्मत के लिए बजट या स्वीकृति की स्थिति क्या थी?




भवन की तकनीकी जांच हुई थी या नहीं?




इन तथ्यों की जांच किए बिना केवल शिक्षक को दोषी ठहराना जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया को अधूरा छोड़ देना होगा।




MDM में भी जिम्मेदारी की स्पष्टता जरूरी




मिड-डे मील यानी PM POSHAN बच्चों के पोषण से जुड़ी महत्वपूर्ण योजना है। इसमें भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और निर्धारित मानकों का पालन बेहद जरूरी है।




यदि कहीं MDM में गड़बड़ी होती है तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि विद्यालय में भोजन बनाने की व्यवस्था क्या है, सामग्री की आपूर्ति कैसे होती है, रसोइया कौन है और शिक्षक की वास्तविक भूमिका क्या निर्धारित है।




जिम्मेदारी जिस व्यक्ति या व्यवस्था की है, कार्रवाई भी उसी के अनुसार होनी चाहिए।




शिक्षक की गलती हो तो कार्रवाई जरूर हो




यह बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि शिक्षकों को किसी भी प्रकार की लापरवाही के लिए संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।




यदि जांच में सामने आता है कि शिक्षक ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित की, सरकारी संसाधनों में गड़बड़ी की या अपने कर्तव्यों का गंभीर उल्लंघन किया, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।




लेकिन कार्रवाई और पूर्वाग्रह में अंतर है।




कार्रवाई का आधार तथ्य और जांच होनी चाहिए, न कि केवल वायरल वीडियो या सोशल मीडिया पर चल रही धारणा।




अच्छे काम की खबर कौन दिखाएगा?




लाखों शिक्षक सीमित संसाधनों के बीच विद्यालयों में लगातार काम कर रहे हैं। कई शिक्षक बच्चों के सीखने के स्तर को सुधारने, नामांकन बढ़ाने, विद्यालय को सुंदर बनाने और नई शिक्षण गतिविधियों को अपनाने के लिए व्यक्तिगत प्रयास करते हैं।




लेकिन ऐसी खबरें अक्सर उतनी चर्चा नहीं पातीं।




“विद्यालय में शिक्षक ने बच्चों के लिए नया नवाचार किया” शायद उतना वायरल न हो, जितना—




“विद्यालय की हालत खराब, शिक्षक पर कार्रवाई!”




यही वह अंतर है जिस पर मीडिया और सोशल मीडिया दोनों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।




पत्रकारिता का उद्देश्य फैसला सुनाना नहीं, सच सामने लाना है




पत्रकार का काम सवाल पूछना है, तथ्यों को सामने लाना है और जनता को वास्तविक स्थिति बताना है। सोशल मीडिया की अपनी कोई अदालत नहीं होनी चाहिए, जहां कुछ मिनटों की वीडियो के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी घोषित कर दिया जाए।




पहले जांच, फिर निष्कर्ष—यही निष्पक्षता का मूल सिद्धांत होना चाहिए।




अगर शिक्षक दोषी है तो कार्रवाई हो।




अगर विभागीय व्यवस्था में कमी है तो संबंधित अधिकारी जवाबदेह हों।




अगर संसाधनों की कमी है तो उसकी जिम्मेदारी तय हो।




अगर सामाजिक परिस्थितियां कारण हैं तो उन्हें भी समझा जाए।




‘अंधेर नगरी’ की याद क्यों आती है?




भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध रचना ‘अंधेर नगरी’ में व्यवस्था पर व्यंग्य करते हुए ऐसी स्थिति दिखाई गई है, जहां न्याय का पैमाना ही उल्टा हो जाता है।




आज अगर हर समस्या का सबसे आसान समाधान केवल शिक्षक को दोषी ठहराना बन जाए, तो यह व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत होगा।




गलती जिसकी हो, कार्रवाई उसी पर हो।




लेकिन बिना पूरी जांच, बिना तथ्यों की पड़ताल और बिना जिम्मेदारी की सही पहचान के किसी शिक्षक को दोषी घोषित करना न निष्पक्ष प्रशासन है और न ही जिम्मेदार पत्रकारिता।




सरकारी शिक्षक को संरक्षण नहीं चाहिए।




उसे चाहिए निष्पक्ष जांच, स्पष्ट जिम्मेदारी और सम्मानजनक व्यवहार।




क्योंकि आखिर में एक बात याद रखनी होगी—




हर सरकारी स्कूल की हर कमी का नाम “मास्टर” नहीं होता।




विद्यालय एक पूरी व्यवस्था है और उसकी सफलता या विफलता की जिम्मेदारी भी केवल एक व्यक्ति पर नहीं डाली जा सकती।

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