सैलरी आते ही 10 दिन में खत्म?
कहां कर रहे हैं गलतियां और ऐसे में क्या करें और क्या ना करें:
फोन पर सैलरी क्रेडिट होने की टोन महीने में एक बार ही सुनाई देती है। बाकी महीने पेमंट, ईएमआई और यूपीआई डेबिट की आवाज़ें ही आती रहती हैं। फिर 10 दिन में अकाउंट खाली होने लगे और महीने के आखिर में ऑफिस आने-जाने के लिए किराए का भी जुगाड़ करना पड़े तो लगता है, सैलरी कम है। लेकिन वजह हमेशा कम सैलरी नहीं, पैसे को संभालने का तरीका भी हो सकता है। सैलरी आते ही क्या करें, किन गलतियों से बचें और पैसा महीनेभर कैसे चलाएं, एक्सपर्ट्स से बात कर जानकारी दे रहे हैं वरुण आानंद
1 लाख सैलरी, फिर भी बचत मुश्किल
नोएडा के 39 साल के रोहित की टेक-होम सैलरी 1 लाख रुपये है। घर की ईएमआई 30 हजार रुपये और बच्चों की फीस, राशन, बिजली-पानी व आने-जाने जैसे ज़रूरी खर्च करीब 35 हजार रुपये हैं। इसके बाद मेडिकल इंश्योरेंस, मोबाइल, ओटीटी, छोटी-मोटी शॉपिंग, वीकेंड आउटिंग, ऑनलाइन खाना और दूसरे खर्चे खाते को लगातार खाली करते रहते हैं। नतीजा, महीने के 10-15 दिन बाद ही रोहित को पैसे कम पड़ने लगते हैं। रोहित ने खर्चों पर नज़र डाली तो कोई बड़ा खर्च नहीं दिखा, लेकिन छोटे-छोटे खर्च जोड़ने पर तस्वीर साफ हो गई। वह हर महीने बचत करने की सोचते हैं, लेकिन कर नहीं पाते। दरअसल, गलती यह है कि सैलरी आते ही उन्होंने पूरे 1 लाख रुपये को खर्च के लिए उपलब्ध मान लिया, जबकि उसका एक हिस्सा पहले ही बचत, सुरक्षा और आने वाले खर्चों के लिए तय होना चाहिए था।
यही सबसे पहली गलती है। सैलरी आपकी पूरी खर्च करने वाली रकम नहीं है। उसमें घर चलाने, भविष्य, सुरक्षा और आने वाले खर्चों का पैसा भी शामिल है।
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पहला कदम: महीने के आखिर में बचत वाली सोच गलत
तमाम लोग सैलरी आने के बाद पहले ज़रूरी और गैर-ज़रूरी खर्च करते हैं और सोचते हैं कि महीने के आखिर में जो बचेगा उसे सेव करेंगे। ऐसी सोच वाले अक्सर यही देखते होंगे कि महीने के आखिर में कुछ बचा ही नहीं। तरीका उल्टा होना चाहिए। सैलरी आते ही पहले सबसे ज़रूरी तय खर्चों और इनवेस्टमेंट के लिए पैसा अलग कर दें। उसके बाद बचे पैसे को महीने के खर्च के लिए इस्तेमाल करें।
मुश्किल है, पर मुमकिन है: शुरुआत में इस तरह चलना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अगर एक बार इस तरीके पर चलने लगे तो बचत की आदत बन जाएगी और बचे पैसों से ही महीना चलाना भी आ जाएगा।
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दूसरा कदम: सैलरी को पांच हिस्सों में बांटें
हर घर के हालात और टेक-होम सैलरी अलग होती है। इसलिए कोई एक फॉर्मूला सबके लिए सही साबित नहीं हो सकता। 50:30:20 जैसे विदेशी फॉर्मूले फाइनैंशल हेल्थ को अच्छा रखने के लिए तो बेहतर माने जाते हैं, लेकिन कई बार इन पर चल पाना मुमकिन नहीं हो पाता। ऐसे में अपनी स्थिति को देखते हुए पैसों को बांटना ज्यादा सही साबित हो सकता है।
1. घर चलाने के लिए: इसमें किराया या ईएमआई, राशन, बिजली-पानी, गैस, स्कूल फीस, घरेलू मदद और ज़रूरी आने-जाने के खर्च शामिल करें। वह पैसा, जिसे खर्च होना ही है।
2. भविष्य के लिए: इसमें एसआईपी, रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई और दूसरे लंबे समय के लक्ष्यों के लिए पैसा रखें। महीने के आखिर में नहीं, सैलरी आते ही इसे अलग करें।
3. इमरजेंसी के लिए: इमरजेंसी फंड और इंश्योरेंस जैसी चीज़ों के लिए रकम रखें। इसका मकसद यह है कि अचानक कोई बड़ा खर्च आ जाए तो रोजमर्रा का बजट ना बिगड़े।
4. आने वाले बड़े खर्चों के लिए: यह हिस्सा बहुत से परिवार छोड़ देते हैं। नतीजा यह होता है कि साल में आने वाले खर्च अचानक बड़ा झटका लगते हैं। मसलन, गाड़ी का बीमा, त्योहार, घर की मरम्मत, शादी-ब्याह में होने वाले खर्च। ये अचानक आने वाले खर्च नहीं हैं। इनके बारे में पहले से पता होता है। इसलिए अगर साल में किसी खर्च पर 60 हजार रुपये लगने हैं तो हर महीने 5 हजार रुपये अलग रखने लगें।
5. ज़िंदगी जीने के लिए: बाहर खाना, घूमना, मूवी, शॉपिंग, सब्सक्रिप्शन और दूसरे खर्च भी बजट का हिस्सा होने चाहिए। अगर इस रणनीति से चलेंगे तो हो सकता है कि शुरुआत के कुछ महीनों में बचत के पैसे तो अलग हो जाएं, लेकिन अपने लिए पैसे ना बचें। लेकिन अगर यह तरीका आदत बन गया तो कुछ महीनों में लाइफ पटरी पर लौट सकती है और इन खर्चों के लिए भी पैसा बच सकता है।
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तीसरा कदम: पहले 10 दिन का खर्च पकड़ें
अगर सैलरी 10 दिन में ही कम पड़ने लगती है तो अगले महीने सबसे पहले शुरुआती 10 दिनों का हिसाब देखें। हर यूपीआई और कार्ड पेमंट को चार हिस्सों में बांटें। ज़रूरत, सुविधा, लाइफस्टाइल और बिना सोचे किए गए खर्च।
-99, 180, 349, 499 जैसे छोटे खर्च अकेले बड़े नहीं लगते, लेकिन जब ऐसी कई रकम जोड़ें तो पता चलता है अच्छा खासा पैसा निकल गया। एक-दो महीने इसकी निगरानी करें तो गलतियां पता चलेंगी, जिन्हें सही कर सकते हैं।
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चौथा कदम: पूरे महीने का पैसा एक साथ खर्च ना करें
मान लीजिए ज़रूरी खर्च निकालने के बाद आपके पास लाइफस्टाइल और दूसरे फ्लेक्सिबल खर्चों के लिए 20 हजार रुपये बचे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि महीने के पहले 10 दिन में 10 हजार खर्च कर दें। रकम को चार हिस्सों में बांट सकते हैं। करीब 5 हजार हर हफ्ते की लिमिट रखें। इससे 10 तारीख को ही पता चल जाएगा कि खर्च लिमिट से आगे जा रहा है या नहीं। महीने की 30 तारीख को पता चलने का कोई फायदा नहीं होगा।
नोट: एक और आदत अपनाएं। हर संडे सिर्फ 10 मिनट बैठकर देखें कि इस हफ्ते कितना खर्च हुआ और कितना पैसा बाकी है।
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पांचवां कदम: सैलरी बढ़े तो पूरा खर्च ना बढ़ाएं
सैलरी बढ़ने पर लाइफस्टाइल पर ज्यादा खर्च करना गलत नहीं है, लेकिन गलती तब होती है, जब सैलरी बढ़ती है 15 फीसदी और लाइफस्टाइल पर खर्च बढ़ा देते हैं 20 या 25 फीसदी। मान लीजिए आपकी सैलरी 1 लाख से बढ़कर 1.15 लाख हो गई। पूरे 15 हजार को नई ईएमआई, महंगे फोन, ज्यादा शॉपिंग और बाहर खाने पर खर्च करने के बजाय इसका कुछ हिस्सा भविष्य के लिए बढ़ाएं। जैसे 7,500 इनवेस्टमेंट, 3,000 रिजर्व या आने वाले खर्चों के लिए और 4,500 लाइफस्टाइल पर खर्च किए जा सकते हैं।
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छठा कदम: महंगी चीज़ खरीदने से पहले 30 दिन रुकें
सैलरी बढ़ते ही बैंक या ऐप आपको ज्यादा लोन लेने की क्षमता दिखा सकते हैं, लेकिन वे आपकी रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई आदि के लिए नहीं बताते। ऐसे में कोई बड़ा फोन, गैजेट या दूसरी महंगी चीज़ खरीदने का मन हो तो 30 दिन रुकने का नियम भी अपना सकते हैं। अगर 30 दिन बाद भी उसकी ज़रूरत महसूस हो और बजट इसकी इजाज़त दे, तभी खरीदने पर विचार करें।
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सातवां कदम: क्रेडिट कार्ड से अगली सैलरी पहले ही खर्च ना करें
क्रेडिट कार्ड सुविधा है, एक्सट्रा इनकम नहीं। इस बात को अच्छी तरह समझ लें। इसे इमरजेंसी के लिए ही रखें। अगर इस महीने की सैलरी आने से पहले ही उसका कुछ हिस्सा पिछले महीने के कार्ड बिल में जाना तय है तो नए महीने की शुरुआत और शून्य यानी 0 से नहीं, बल्कि माइनस से कर रहे हैं। इसलिए ऐसी खरीदारी से बचें, जिसकी पेमंट करने के लिए अगली सैलरी का इंतज़ार करना पड़े। आज की खरीदारी के लिए कल की सैलरी खर्च करना पैसों की कमी का बड़ा कारण बन सकता है।
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अगले महीने से अपनाएं यह प्लान
दिन 1: सैलरी आते ही ज़रूरी खर्च और इनवेस्टमेंट की रकम अलग करें।
दिन 2: आने वाले सालाना खर्चों के लिए पैसा अलग रखें। साथ ही इमरजेंसी फंड के लिए तय रकम निकालें।
दिन 3: पूरे महीने के गैर-ज़रूरी खर्च की लिमिट तय करें।
हर संडे: 10 मिनट खर्च कितना हुआ, कितना बैलंस बचा, यह देखने में दें।
दिन 10: पहले 10 दिनों के यूपीआई और कार्ड खर्च को देखें।
दिन 15: महीने के बीच में देखें कि कितना पैसा बचा है।
दिन 25: अगले महीने आने वाले बड़े खर्चों की लिस्ट देखें।
महीने के आखिर में: अगर पैसा बच गया है तो उसे सिर्फ इसलिए खर्च ना करें कि नया महीना आने वाला है। उसे भविष्य की ज़रूरत को देखते हुए रिजर्व में डालें। ध्यान रखें कि पैसा हमेशा अनुशासन मांगता है। सैलरी कम या ज्यादा बाद में होती है, वह बचेगी या नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि हम उसके साथ क्या करते हैं।
एक्सपर्ट पैनल:
-तारेश भाटिया, सर्टिफाइड फाइनैंशल प्लानर
-सुधीर कुमार गुप्ता, फाइनैंशल प्लानर
