स्कूल ठीक करो’ मुहिम और एक कड़वा सवाल—आखिर स्कूल खराब क्यों हैं?
‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ (CJP) की ‘स्कूल ठीक करो’ मुहिम ने सरकारी स्कूलों की बदहाल व्यवस्थाओं पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद इस अभियान का दायरा बढ़ाने और अब सार्वजनिक अस्पतालों की स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी आवाज उठाने की बात सामने आई है।
इस मुहिम की शुरुआत CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके ने महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में अपने गांव के स्कूल से की थी। उनका कहना है कि उद्देश्य केवल स्कूलों की कमियां गिनाना नहीं, बल्कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सुधार की प्रक्रिया शुरू करना है।
📱 बच्चे खुद दिखा रहे हैं अपने स्कूलों की तस्वीर
सोशल मीडिया पर अभियान को मिल रही प्रतिक्रिया के बीच कई बच्चे अपने स्कूलों की समस्याओं के वीडियो भी सामने ला रहे हैं।
कहीं शिक्षक कम हैं, कहीं बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त बेंच नहीं हैं, तो कहीं विद्यालय तक पहुंचने के लिए सड़क तक की सुविधा नहीं है।
और यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—
❓ अगर स्कूल में शिक्षक है, लेकिन भवन की हालत खराब है तो जिम्मेदार कौन?
❓ अगर बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर नहीं है तो जिम्मेदार कौन?
❓ अगर शौचालय, पानी, बिजली या सड़क की समस्या है तो जिम्मेदार कौन?
❓ अगर विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं तो इसका जवाब कौन देगा?
⚠️ सबसे आसान जवाब अक्सर होता है—‘शिक्षक जिम्मेदार है।’
CJP सरकार से पूछेगी—स्कूल क्यों नहीं ठीक हैं?
सरकार शायद शिक्षकों से पूछेगी—स्कूल क्यों नहीं ठीक है?
और शिक्षक कहेगा—हम पढ़ाने के लिए विद्यालय में हैं, लेकिन भवन, फर्नीचर, शौचालय, पानी, बिजली, सड़क और पर्याप्त स्टाफ की व्यवस्था करना अकेले हमारे हाथ में नहीं है।
फिर भी अंत में सवाल घूम-फिरकर शिक्षक तक पहुंच जाता है।
👨🏫 शिक्षक को जवाबदेह होना चाहिए—बिल्कुल होना चाहिए।
लेकिन जवाबदेही का अर्थ यह नहीं हो सकता कि जिसके पास सबसे कम संसाधन और सबसे कम प्रशासनिक अधिकार हैं, सारी जिम्मेदारी उसी के सिर डाल दी जाए।
एक सरकारी स्कूल केवल शिक्षक से नहीं बनता।
🏫 स्कूल = शिक्षक + बच्चे + अभिभावक + ग्राम पंचायत + विभाग + प्रशासन + सरकार
अगर इनमें से किसी एक की जिम्मेदारी पूरी नहीं होती, तो उसका असर सीधे बच्चों पर पड़ता है।
💔 सबसे ज्यादा दुख तब होता है जब व्यवस्था की कमी का खामियाजा उस बच्चे को भुगतना पड़ता है, जो अपनी जिंदगी बदलने के लिए सरकारी स्कूल में पढ़ने आया है।
बच्चे को इससे मतलब नहीं कि बजट किस विभाग ने रोका, फर्नीचर किस योजना से आना था, भवन किस एजेंसी ने बनाना था या शिक्षक की भर्ती कब होनी थी।
उसे सिर्फ इतना चाहिए—
📚 अच्छा शिक्षक
🪑 बैठने की जगह
🚰 साफ पानी
🚻 स्वच्छ शौचालय
💡 बिजली
🏫 सुरक्षित विद्यालय
❤️ और ऐसा वातावरण जहां वह सम्मान के साथ पढ़ सके।
👉 इसलिए ‘स्कूल ठीक करो’ केवल किसी राजनीतिक दल की मुहिम नहीं होनी चाहिए।
यह हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि, हर अधिकारी, हर ग्राम पंचायत, हर अभिभावक और हर शिक्षक की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए।
सरकार सवाल पूछे—लेकिन समाधान भी दे।
अधिकारी जवाबदेही तय करें—लेकिन संसाधन भी उपलब्ध कराएं।
शिक्षक जिम्मेदारी निभाए—लेकिन शिक्षक को आवश्यक सुविधाएं भी मिलें।
अभिभावक सवाल करें—लेकिन स्कूल के साथ खड़े भी हों।
और सबसे जरूरी—इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में ‘बच्चा’ होना चाहिए, न कि सिर्फ ‘दोषी कौन है’।
🇮🇳 स्कूल बेहतर होंगे, तभी बच्चों का भविष्य बेहतर होगा।
स्कूल = शिक्षक + बच्चे + अभिभावक + पंचायत + विभाग + प्रशासन + सरकार
👉 सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि दोषी कौन है?
👉 सवाल यह भी होना चाहिए कि स्कूल बेहतर कैसे होंगे?

