शक्ल न मिलने पर बेटी को मारने वाले पिता को उम्रकैद
आगरा। खंदौली थाना क्षेत्र में वर्ष 2022 में पत्नी और एक वर्षीय बेटी की हत्या के मामले में अदालत ने दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। पत्नी के चरित्र पर शक और बेटी से शक्ल न मिलने के संदेह में किए इस दोहरे हत्याकांड में अधिकांश गवाह मुकर गए थे। इसके बावजूद कोर्ट ने फोरेंसिक रिपोर्ट, बरामदगी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषी मानते हुए एक लाख का जुर्माना भी लगाया।
वादी बलवीर सिंह निवासी गांव धर्मपुरा थाना फरह जिला मथुरा ने थाना खंदौली में अक्तूबर 2022 में तहरीर देकर बताया था कि उसकी पुत्री ममता देवी (27) की शादी मनमोहन के साथ 26 जनवरी 2016 को हुई थी। उसकी पुत्री के पांच साल का पुत्र आरव और एक साल की पुत्री सौम्या थी। आरोपी आए दिन उसकी बेटी से मारपीट करता था। 10 अक्तूबर 2022 की सुबह आरोपी के चाचा ने फोन से सूचना दी कि बेटी ममता की मृत्यु हो गई है। वो परिवारीजनों के साथ बेटी की ससुराल पैंतखेड़ा पहुंचा तो पता चला कि बेटी ममता व धेवती सौम्या (1 वर्ष) की मनमोहन ने 9-10 अक्तूबर 22 की रात में हत्या कर दी। तहरीर में बताया कि घटना की साजिश में शामिल पति समेत अन्य ससुरालीजन वहां नहीं मिले थे।
कांच के टुकड़े से गले पर किया था वार
पुलिस ने 13 अक्तूबर 22 को आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि ममता का मुंह, गला दबाकर और मारपीट कर जघन्य तरीके से हत्या की। बेटी सौम्या शोर सुनकर जग गई तो उसका भी मुंह एवं गला दबाकर हत्या कर दी। मारपीट के दौरान शीशा टूट गया तो कांच के टुकड़े से पत्नी ममता के गले पर वार किया। उसकी निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त कांच का टुकड़ा बरामद किया था। विधि विज्ञान प्रयोगशाला की जांच में उक्त कांच के टुकड़े को हत्या करने में इस्तेमाल की पुष्टि हुई।
मायके में दी थी शक की जानकारी
एडीजीसी ने बताया कि बेटी से शक्ल नहीं मिलने पर आरोपी मनमोहन अपनी पत्नी ममता पर शक करता था और इसी को लेकर दोनों में झगड़ा होता था। आरोपी मारपीट करता था। यह मृतका के चाचा पूरन सिंह के बयान में निकल कर आया कि ममता अपनी लड़की और लड़के के साथ रक्षाबंधन पर आई थी। तब उसने मायके आकर हम सभी लोगों को बताया था।
हत्या को देना चाहते थे बंदरों के हमले से मौत
एडीजीसी हेमंत दीक्षित ने बताया कि मामले में वादी बलवीर सिंह, डॉ. विनीत राय, उपनिरीक्षक उमेश तिवारी, रमित कुमार आर्य, रिटायर्ड अपर आयुक्त रामप्रकाश, प्रभारी निरीक्षक आनंद वीर, तथ्य के गवाह राहुल कुमार, पूरन सिंह, गवाह मयंक मिश्रा, शुभम शर्मा को गवाही में पेश किया। कई गवाह पक्षद्रोही हो गए। वहीं, आरोपी की ओर से बचाव साक्ष्य में विजय सिंह, लक्ष्मीकांत व मनोज कुमार को पेश किया गया। एडीजीसी ने बताया कि बचाव साक्ष्य के गवाह मृतक की हत्या को बंदरों द्वारा किए हमले से जोड़ना चाहते थे।
बालक को बाल सेवा योजना से दिलाएं सहायता
अदालत ने डीएम से कहा कि यदि नियमानुसार संभव हो तो उक्त बालक की शिक्षा-दीक्षा के लिए राज्य सरकार द्वारा संचालित आवासीय विद्यालय में प्रवेश दिलाए जाने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए। साथ ही उप्र मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के अधीन सहायता दिलाए जाने की आवश्यकता है। यह भी निर्देशित किया कि मृतका के पुत्र जिसका कोई भी जैविक माता-पिता कमाने की स्थिति में नहीं है, उसे उपरोक्त योजना से सहायता दिलाए जाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से राज्य सरकार से अपेक्षा की जाए। वहीं, जुर्माने की राशि एक लाख में से 80 प्रतिशत धनराशि मृतका के नाबालिग पुत्र आरव के पक्ष में बैंक में जमा कराया जाए।
मनुस्मृति का हवाला देकर साक्ष्य के महत्व पर टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी अपराध ऐसा नहीं होता, जिसके बाद कोई साक्ष्य शेष न बचे। निर्णय में इस संदर्भ में मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अपराध करने वाला भले ही यह समझे कि उसे किसी ने नहीं देखा, लेकिन उसके कर्मों के प्रमाण अंततः सामने आ ही जाते हैं। अदालत ने आदेश में मनुस्मृति का यह श्लोक भी उद्धृत किया—
‘मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चिद् पश्यतीति नः।
तांस्तु देवा: प्रपश्यन्ति स्वस्येवान्तरपुरुषः॥
द्यौर्भूमिरापो हृदयं चन्द्रार्काग्नियमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम्

