कोर्ट हैरान, अध्यक्ष टॉस से करते हैं टीजीटी भर्ती परीक्षा प्रश्नपत्रों का चयन
प्रयागराज। टीजीटी भर्ती परीक्षा के मामले में बुधवार को सुनवाई के दौरान उप्र शिक्षा सेवा आयोग के वकील के शाही ने कोर्ट को बताया कि प्रश्नपत्र अलग-अलग एजेंसियों से तैयार करवाए जाते हैं। दो एजेंसियां दो-दो सेट पेपर तैयार कर आयोग को सौंपती हैं, फिर चेयरमैन उनमें से किसी एक सेट का रैंडम चयन करते हैं। कोर्ट ने जानना चाहा कि एजेंसियों द्वारा तैयार प्रश्न सही हैं या गलत, इसकी जांच कैसे होती है। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि आयोग अध्यक्ष टॉस से प्रश्न पत्र का चयन करते हैं जबकि प्रश्नों की विश्वसनीयता देखने का आयोग के पास कोई मैकेनिज्म नहीं है।
पचास प्रतिशत सवाल गलत हो तो क्या परीक्षा रद्द करेंगे : कोर्ट ने कहा मौजूदा विवाद में 33 प्रश्नों के गलत या आउट ऑफ सेलेबस होने का आरोप है। कुल 125 प्रश्नों का लगभग 25 फीसदी, अगर 50 प्रतिशत सवाल गलत हो तो आयोग क्या करेगा, क्या परीक्षा रद्द की जाएगी। आयोग की ओर से कहा गया कि गलत सवालों के अंक समान रूप से अन्य प्रश्नों में वितरित कर दिए जाते हैं। एजेंसी पर गलत सवाल के लिए एक लाख रुपये प्रति सवाल जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। कोर्ट ने कहा आयोग के कार्यों में पारदर्शिता होनी चाहिए, क्योंकि छात्रों को प्रकिया की जानकारी नहीं है। ऐसे में गलत लोग उनका फायदा उठाते हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आर्थिक दंड के अलावा एजेंसी पर क्या कोई और कार्रवाई जैसे ब्लैक लिस्ट करने की व्यवस्था है। याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा ने कहा कि आयोग इस बात का खुलासा नहीं कर रहा है कि इन 33 प्रश्नों में से वो कौन से प्रश्न हैं, जो गलत हैं। आयोग का कहना था छात्रों की आपत्तियों पर विचार करने के बाद 25 प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर के पाए गए हैं जबकि आठ सवाल सही पाए गए हैं। राधाकांत ओझा का कहना था कि उन आठ प्रश्नों की भी जानकारी प्रतियोगियों को दी जाए ताकि उनमें से यदि कोई प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर से हो तो उस पर आपत्ति की जा सके। कोर्ट ने 17 अगस्त तक आयोग को वह आठ प्रश्न याचियों को बताने का निर्देश दिया है।
अगली सुनवाई एक को
हाईकोर्ट ने आयोग के सचिव से कहा है कि वह भविष्य में ऐसी गलतियों को रोकने के लिए कदम उठाएं। कोर्ट का कहना था कि आयोग क्या प्रक्रिया अपनाएगा इसमें अदालत दखल नहीं देगी, मगर कदम उठाना जरूरी है। इस मामले में अगली सुनवाई एक सितंबर को होगी।
25 प्रतिशत प्रश्नों का गलत होना समझ से परे
कोर्ट ने प्रश्नपत्रों में इतनी बड़ी गलतियों पर नाराजगी जताते हुए कहा कि आयोग सिर्फ एक नोडल एजेंसी है। इसके अतिरिक्त उसकी कोई और भूमिका नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे भी निर्णय है जिनमें आयोग की आवश्यकता को ही गैरजरूरी बताया गया है। क्या हमें यहां यह प्रश्न उठाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि एक प्रश्नपत्र में तीन चार गलतियां हों यह तो समझा जा सकता है मगर 25 प्रतिशत तक सवाल गलत हों यह समझ से परे है। हालांकि अभी इस सुनवाई से संबंधित हाईकोर्ट का आदेश वेबसाइट पर अपलोड नहीं हो सका है।
प्रयागराज। टीजीटी भर्ती परीक्षा के मामले में बुधवार को सुनवाई के दौरान उप्र शिक्षा सेवा आयोग के वकील के शाही ने कोर्ट को बताया कि प्रश्नपत्र अलग-अलग एजेंसियों से तैयार करवाए जाते हैं। दो एजेंसियां दो-दो सेट पेपर तैयार कर आयोग को सौंपती हैं, फिर चेयरमैन उनमें से किसी एक सेट का रैंडम चयन करते हैं। कोर्ट ने जानना चाहा कि एजेंसियों द्वारा तैयार प्रश्न सही हैं या गलत, इसकी जांच कैसे होती है। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि आयोग अध्यक्ष टॉस से प्रश्न पत्र का चयन करते हैं जबकि प्रश्नों की विश्वसनीयता देखने का आयोग के पास कोई मैकेनिज्म नहीं है।
पचास प्रतिशत सवाल गलत हो तो क्या परीक्षा रद्द करेंगे : कोर्ट ने कहा मौजूदा विवाद में 33 प्रश्नों के गलत या आउट ऑफ सेलेबस होने का आरोप है। कुल 125 प्रश्नों का लगभग 25 फीसदी, अगर 50 प्रतिशत सवाल गलत हो तो आयोग क्या करेगा, क्या परीक्षा रद्द की जाएगी। आयोग की ओर से कहा गया कि गलत सवालों के अंक समान रूप से अन्य प्रश्नों में वितरित कर दिए जाते हैं। एजेंसी पर गलत सवाल के लिए एक लाख रुपये प्रति सवाल जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। कोर्ट ने कहा आयोग के कार्यों में पारदर्शिता होनी चाहिए, क्योंकि छात्रों को प्रकिया की जानकारी नहीं है। ऐसे में गलत लोग उनका फायदा उठाते हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि आर्थिक दंड के अलावा एजेंसी पर क्या कोई और कार्रवाई जैसे ब्लैक लिस्ट करने की व्यवस्था है। याचियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा ने कहा कि आयोग इस बात का खुलासा नहीं कर रहा है कि इन 33 प्रश्नों में से वो कौन से प्रश्न हैं, जो गलत हैं। आयोग का कहना था छात्रों की आपत्तियों पर विचार करने के बाद 25 प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर के पाए गए हैं जबकि आठ सवाल सही पाए गए हैं। राधाकांत ओझा का कहना था कि उन आठ प्रश्नों की भी जानकारी प्रतियोगियों को दी जाए ताकि उनमें से यदि कोई प्रश्न पाठ्यक्रम के बाहर से हो तो उस पर आपत्ति की जा सके। कोर्ट ने 17 अगस्त तक आयोग को वह आठ प्रश्न याचियों को बताने का निर्देश दिया है।

